Ranchi: प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आ रही धांधलियों और पेपर लीक की घटनाओं ने देश के युवाओं के भविष्य को अनिश्चितता में धकेल दिया है. इसी कड़ी में झारखंड की हेमंत सरकार ने 14वीं जेपीएससी प्रारंभिक परीक्षा, जेपीएससी बैकलॉग परीक्षाओं के साथ-साथ बहुचर्चित जेएसएससी सीजीएल और टीडीपीएल एजेंसी के जरिए आयोजित सभी परीक्षाओं को रद्द करने का औपचारिक निर्णय लिया है. देश के सबसे बड़े शैक्षणिक और प्रशासनिक घोटालों में मध्य प्रदेश का एमपीपीएससी 2013 का व्यापम घोटाला शामिल है. इस बड़े रैकेट के उजागर होने के बाद राज्य में कोहराम मच गया था. स्थिति इतनी गंभीर थी कि अदालत और जांच एजेंसियों के हस्तक्षेप के बाद नियुक्तियों को अवैध घोषित कर रद्द किया गया था. सीबीआइ की लंबी जांच और सख्त कानूनी कार्रवाई के बाद न केवल कई भ्रष्ट अधिकारी और दलाल बर्खास्त किए गए, बल्कि उनमें से कई को लंबी जेल की सजा भी भुगतनी पड़ी.

राजस्थान, यूपी और बिहार में परीक्षाओं को लेकर रहा है विवाद
राजस्थान में आरएएस 2013 की प्रतिष्ठित परीक्षा के दौरान पेपर लीक होने का बड़ा मामला सामने आया था. यह खुलासा परीक्षा होने के लगभग दो साल बाद हुआ था, जिसके बाद पूरी परीक्षा प्रक्रिया को रद्द कर दिया गया था. राज्य में नए सिरे से दोबारा परीक्षा आयोजित की गई। हालांकि, जिन पुराने अभ्यर्थियों की नियुक्ति पहले ही हो चुकी थी और जो प्रशिक्षण या सेवा में थे, उन्हें लेकर कानूनी और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया गया; उनकी सेवाएं पूरी तरह से समाप्त नहीं की गईं, लेकिन उनके मामलों की लंबी प्रशासनिक और न्यायिक जांच चली.
उत्तर प्रदेश में भी हुआ था पेपर लीक
उत्तर प्रदेश में यूपीपीएससी 2011 की परीक्षा के दौरान बड़े पैमाने पर पेपर लीक और कॉपियों में हेराफेरी के गंभीर आरोप सामने आए थे. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के कड़े हस्तक्षेप के बाद उस पूरी परीक्षा को रद्द कर दिया गया था. इसके बाद नए सिरे से परीक्षा की प्रक्रिया पूरी की गई। जो पीसीएस (PCS) अधिकारी पहले से चयनित होकर कार्यभार संभाल चुके थे, उनकी विशेष जांच कराई गई। जांच के दायरे में जो लोग सीधे तौर पर गड़बड़ी में लिप्त पाए गए, उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया, जबकि बिना गलती वाले कई अधिकारियों को कड़ी कानूनी लड़ाइयों के बाद राहत मिली.
पड़ोसी राज्य बिहार भी पेपर लीक मामले में अछूता नहीं
बीपीएससी की प्रमुख परीक्षाओं के दौरान भी पेपर लीक और सोशल मीडिया पर प्रश्नपत्र वायरल होने जैसी घटनाएं सामने आई थीं. विवाद तूल पकड़ने के बाद आयोग और सरकार ने त्वरित कदम उठाते हुए परीक्षा को पूरी तरह रद्द कर दिया और कुछ ही समय के भीतर बेहद कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच दोबारा परीक्षा संपन्न कराई.
क्या कहता है कानून
- अनुच्छेद 315 और 320: संविधान के ये अनुच्छेद लोक सेवा आयोगों की स्वतंत्रता, गठन और उनके उत्तरदायित्वों को परिभाषित करते हैं. इसके अनुसार, आयोग का मुख्य कर्तव्य पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से योग्य उम्मीदवारों का चयन करना है. यदि चयन प्रक्रिया में व्यापक पैमाने पर गड़बड़ी या भ्रष्टाचार साबित होता है, तो सरकार या न्यायालय के पास उस पूरी परीक्षा को रद्द करने का पूर्ण अधिकार होता है.
- अनुच्छेद 14 और 16: ये अनुच्छेद देश के प्रत्येक नागरिक को विधि के समक्ष समानता और सार्वजनिक रोजगार के अवसर में समानता का मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं. न्यायविदों का मानना है कि यदि किसी परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है, तो पूरी चयन प्रक्रिया दूषित हो जाती है. निष्पक्ष परीक्षा’ देना हर उस मेधावी अभ्यर्थी का मौलिक अधिकार है जो दिन-रात मेहनत करता है। ऐसे में धोखाधड़ी से ग्रसित प्रक्रिया को अवैध करार देना पूरी तरह से संवैधानिक और न्यायसंगत है.
सेवा में नियुक्त अभ्यर्थियों का भविष्य
- चयन के बाद ज्वाइनिंग न होने पर: यदि परीक्षा का परिणाम आ चुका था लेकिन अभी तक ज्वाइनिंग नहीं हुई थी, तो प्रशासनिक आदेश के तहत वह नियुक्ति प्रक्रिया तत्काल प्रभाव से रोक दी जाती है. इसके बाद नए सिरे से परीक्षा आयोजित कर मेधा सूची बनाई जाती है.
- नौकरी कर रहे कर्मियों पर असर: जो अभ्यर्थी परीक्षा पास करके पहले से सेवा दे रहे हैं, यदि वे अदालत का रुख करते हैं, तो न्यायालय यह देखता है कि क्या उस व्यक्तिगत अभ्यर्थी की कोई प्रत्यक्ष गलती थी या नहीं. यदि जांच में अभ्यर्थी की संलिप्तता या भ्रष्टाचार साबित नहीं होता है, तो उसे तुरंत बर्खास्त नहीं किया जा सकता. प्रॉक्सी कैंडिडेट बैठाने या पैसे देकर नौकरी हासिल करने जैसे मामले साबित होने पर ही बर्खास्तगी की कार्रवाई तय होती है.
- डॉक्टरीन ऑफ लेजिटिमेट एक्सपेक्टेशन : जो लोग पिछले कुछ वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं, अदालतों में उनके मामलों की सुनवाई के दौरान इस सिद्धांत को प्रमुखता दी जाती है. ज्यादातर मामलों में यदि कर्मचारी निर्दोष पाया जाता है, तो उसकी सेवा सुरक्षित बचा ली जाती है, हालांकि कई बार उनके प्रमोशन पर रोक लग सकती है या प्रशासनिक दंड मिल सकता है, लेकिन सामान्यतः वेतन की रिकवरी नहीं की जाती है.

