रांची: झारखंड की सियासत में इन दिनों मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का नया आधिकारिक आवास चर्चा और विवादों का केंद्र बना हुआ है. जहां एक ओर राज्य का आम जनमानस जर्जर सड़कों, बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था और बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री के लिए लगभग ₹100 करोड़ की लागत से ‘शीशमहल’ बनाए जाने की योजना पर सवाल उठ रहे हैं. इस प्रोजेक्ट के लिए ₹67 करोड़ का टेंडर जारी होने के बाद विवाद और गहरा गया है.
बीजेपी का तीखा हमला
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए इसे “जनता की गाढ़ी कमाई की लूट” करार दिया है. विपक्ष का कहना है कि जिस राज्य में ग्रामीण सड़कें जर्जर हैं और युवा रोजगार के लिए पलायन कर रहे हैं, वहां मुख्यमंत्री के आलीशान आवास की क्या प्राथमिकता है. बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार ‘जल, जंगल, जमीन’ के मुद्दों से भटककर अब विलासिता की ओर बढ़ गई है.
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जमीनी हालात बनाम सरकारी खर्च
राज्य की जमीनी स्थिति पर नजर डालें तो राजधानी रांची समेत कई इलाकों में बिजली और पेयजल संकट बना हुआ है. वहीं रिम्स (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान) जैसे बड़े अस्पतालों में भी संसाधनों की कमी की शिकायतें सामने आती रही हैं. इसके बावजूद बड़े पैमाने पर मुख्यमंत्री आवास को ‘हाई-टेक’ बनाने पर खर्च को लेकर आम जनता के बीच सवाल उठ रहे हैं.
राजनीतिक असर की संभावना
जनता के बीच यह चर्चा तेज है कि क्या एक मुख्यमंत्री का आवास राज्य की बुनियादी जरूरतों से ज्यादा महत्वपूर्ण है. इस पूरे मामले ने नैतिकता और जवाबदेही को लेकर बहस छेड़ दी है. आने वाले समय में यह मुद्दा झारखंड की राजनीति में बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है.
