रांची: सीएम हेमंत सोरेन ने असम के चाय बागान श्रमिकों और विस्थापित आदिवासी समाज की स्थिति पर एक बेहद भावुक और कड़ा प्रहार किया है. सोरेन ने कहा कि जिस समाज ने अपने खून-पसीने से चाय बागानों को सींचकर असम की वैश्विक पहचान गढ़ी, आज वही समाज अपने ही घर में हाशिए पर खड़ा है. उन्होंने इसे लोकतंत्र पर गहरा सवाल बताते हुए ऐतिहासिक न्याय की मांग की है.
कुली शब्द और टी ट्राइब की पहचान पर कड़ा प्रहार
मुख्यमंत्री ने चाय बागान श्रमिकों के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्दों पर गहरी आपत्ति जताई. सोरेन ने कहा कि टी ट्राइब जैसे शब्दों में बांधकर आदिवासियों के अधिकारों को सीमित कर दिया गया है. आज भी कुली जैसे अपमानजनक शब्दों का प्रयोग उनके प्रति सदियों पुरानी शोषणकारी मानसिकता को दर्शाता है. जिन हाथों ने अर्थव्यवस्था की नींव रखी, उनके पास न जमीन का हक है, न शिक्षा में बराबरी और न ही सामाजिक सम्मान.
अंग्रेजों ने आदिवासियों को उनके मूल घरों से दूर ले जाकर बागानों में झोंक दिया था, लेकिन आजादी के दशकों बाद भी उनकी स्थिति में कोई मूलभूत बदलाव न आना एक बड़ी विडंबना है.
यह राजनीतिक नहीं, पहचान की लड़ाई है
हेमंत सोरेन ने स्पष्ट किया कि यह केवल चुनावी या राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सम्मान, पहचान और ऐतिहासिक न्याय का मामला है. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या धरती की अर्थव्यवस्था खड़ा करने वालों को अपने अस्तित्व के लिए हमेशा संघर्ष करना पड़ेगा?
