रांची: झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) ने निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम से होने वाले बेलगाम रेफरल को रोकने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है.रिम्स प्रबंधन ने अब मरीजों को भेजने की प्रक्रिया को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के लिए मानक कार्यप्रणाली (एसओपी) तैयार की है. इसका मुख्य उद्देश्य गंभीर मरीजों को बिना किसी प्राथमिक उपचार या तैयारी के रिम्स के दरवाजे पर छोड़ने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाना है.
40 प्रतिशत मरीज निजी अस्पतालों द्वारा रेफर किए जाते हैं:
रिम्स प्रबंधन द्वारा साझा किए गए आंकड़े चौंकाने वाले हैं. संस्थान में आने वाले कुल मरीजों में से लगभग 40 प्रतिशत मरीज निजी अस्पतालों द्वारा रेफर किए जाते हैं.सबसे ज्यादा मरीज शाम पांच बजे से रात नौ बजे के बीच रेफर किए जाते हैं. इमरजेंसी में कुल 5,994 मरीज आए, जिनमें से 1,200 वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे.कुल 6,038 मरीज पहुंचे, जिनमें वेंटिलेटर वाले मरीजों की संख्या बढ़कर 1,328 हो गई.इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि रिम्स पर गंभीर मरीजों का अत्यधिक दबाव है, जिसमें एक बड़ी हिस्सेदारी निजी अस्पतालों से आए मरीजों की है.
निजी अस्पतालों की मनमानी और लापरवाही:
बैठक के दौरान रिम्स प्रबंधन ने उन गंभीर खामियों को उजागर किया जो मरीजों की जान जोखिम में डालती हैं. अक्सर देखा गया है कि बिना चिकित्सकीय आवश्यकता के मरीज रेफर कर दिए जाते हैं. गंभीर मरीजों को स्टेबलाइज किए बिना ही रिम्स भेज दिया जाता है.मरीज के पास पैसे खत्म होने पर इलाज से इनकार कर उन्हें सरकारी अस्पताल की ओर मोड़ दिया जाता है. पर्याप्त संसाधन न होने के बावजूद मरीज को भर्ती करना और फिर स्थिति बिगड़ने पर हाथ खड़े कर देना.
क्या कहती है नई SOP?
अब किसी भी निजी अस्पताल के लिए रिम्स में मरीज भेजना इतना आसान नहीं होगा. नई नियमावली के तहत मरीज को भेजने से पहले उसकी स्थिति का सही आकलन और आवश्यक प्राथमिक उपचार देना होगा. गंभीर मरीज को ट्रांसफर करने से पहले उसकी हालत स्थिर करना अनिवार्य है. रेफरल के कागजों पर यह स्पष्ट लिखना होगा कि मरीज को किस ठोस आधार पर रेफर किया जा रहा है. गंभीर मरीजों को भेजने से पहले रिम्स में आईसीयू बेड और वेंटिलेटर की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी.
