सरायकेला: रन फॉर गजराज से बर्ड फेस्टिवल तक, ग्राम सभा को दरकिनार कर फैसले क्यों?

सरायकेला: चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के गोलचक्कर एक होटल में माझी बाबा सह कार्जी बाबा मनोहर हांसदा एवं सत्यनारायण मुर्मू ने संयुक्त रूप...

सरायकेला: चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के गोलचक्कर एक होटल में माझी बाबा सह कार्जी बाबा मनोहर हांसदा एवं सत्यनारायण मुर्मू ने संयुक्त रूप में प्रेस वार्ता कर बताया, कि दुर्भाग हे कि दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की तराई क्षेत्र से जुड़े 135 गांव आज एक गंभीर सवाल उठ रहे हैं. क्या विकास के नाम पर लिए जा रहे फैसले वास्तव में ग्राम सभाओं की सहमति से हो रहे हैं या गांवों को दरकिनार कर योजनाएं लागू की जा रही हैं?

दलमा क्षेत्र में पहले “Run for Gajraj” जैसे बड़े आयोजन हुए. प्रचार-प्रसार हुआ, बाहरी प्रतिभागी आए और पुरस्कार लेकर लौट गए.  लेकिन स्थानीय युवाओं को न पर्याप्त तैयारी का अवसर मिला, न प्राथमिकता. अब बर्ड फेस्टिवल के लिए 1500 रुपये पंजीकरण शुल्क तय किया गया है. जिस क्षेत्र में अधिकांश परिवार आर्थिक संघर्ष से गुजर रहे हो, वहां इतनी राशि स्थानीय छात्र-छात्राओं के लिए अवसर कम और बाधा अधिक बन सकती है.

135 गांवों पर सख्ती पर भागीदारी कहां?

ईको-सेंसिटिव जोन के नाम पर 135 गांवों की गतिविधियों पर सख्त नियम लागू हैं. जमीन, जंगल, निर्माण और पारंपरिक अधिकारों पर निगरानी, लेकिन जब बड़े आयोजन और योजनाएं बनाई जाती हैं, तो क्या ग्राम सभाओं की स्पष्ट सहमति ली जाती है? यदि नियम गांवों पर लागू होते हैं, तो निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी भी अनिवार्य क्यों नहीं?

दलमा क्षेत्र गांवों के जमीनी हकीकत

दलमा बिहोड़ो में अनेक गांवों में आज भी आदिवासी और मूलवासी परिवार शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं. कई परिवारों के पास स्थायी आय नहीं है. युवाओं के पास संसाधनों और मार्गदर्शन की कमी है. ऐसे में एक सवाल स्वाभाविक है, जितनी योजनाएं और आयोजन लाए जा रहे हैं, यदि उनका कुछ प्रतिशत भी सीधे जरूरतमंद गांवों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका पर खर्च किया जाए, तो वही वास्तविक विकास कार्य कहलाएगा.

विषय विरोध का नहीं, प्राथमिकता का है

विकास का स्वागत है. पर्यावरण संरक्षण भी आवश्यक है. लेकिन 135 गांवों की उपेक्षा कर,उनकी सहमति और प्राथमिक जरूरतों को पीछे रखकर किया गया कोई भी प्रयास अधूरा रहेगा. विकास तभी सच्चा होगा, जब वह गांवों की भागीदारी, सम्मान और जरूरतों को केंद्र में रखेगा.

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