रांची: झारखंड, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और खनिज संपदा के लिए जाना जाता है, आज एक स्याह हकीकत से जूझ रहा है. राज्य में हर साल सैकड़ों बेटियां घर से निकलती तो हैं, लेकिन कभी वापस नहीं लौटतीं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के पिछले पांच वर्षों के आंकड़े एक डरावने पैटर्न की ओर इशारा कर रहे हैं. गरीबी, बेरोजगारी और बेहतर जिंदगी के झूठे झांसे ने झारखंड को ह्यूमन ट्रैफिकिंग (मानव तस्करी) का एक बड़ा केंद्र बना दिया है.

झारखंड में लापता लड़कियां जिला-वार ग्राफ

जिला लापता लड़कियां (केस)
रांची 62
पूर्वी सिंहभूम 58
धनबाद 44
बोकारो 39
गिरिडीह 36
दुमका 34
देवघर 29
साहिबगंज 27
गोड्डा 24
पलामू 23
गढ़वा 21
चतरा 19
जामताड़ा 17
पाकुड़ 16
खूंटी 14
लोहरदगा 12
सिमडेगा 11
लातेहार 9
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5 साल का झारखंड ट्रेंड (NCRB)
साल लापता नाबालिग लड़कियां
2019 – 481
2020 – 414
2021 – 401
2022 – 420
2023 – 430
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क्यों गायब हो रही हैं लड़कियां
विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि इसके पीछे कई कारण हैं.
-मुख्य कारण
-मानव तस्करी
-घरेलू काम के नाम पर शहरों में भेजना
-गरीबी और बेरोजगारी
-शिक्षा की कमी
-सोशल मीडिया और झूठे नौकरी के झांसे
-कई मामलों में एजेंट गांवों में जाकर दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और मुंबई में नौकरी दिलाने का लालच देते हैं.
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मानव तस्करी से जुड़ता कनेक्शन
रिपोर्टों के अनुसार झारखंड मानव तस्करी के लिहाज से भी संवेदनशील राज्य है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2022 में 125 लड़कियां और 43 लड़के तस्करी के शिकार हुए, जिनमें बड़ी संख्या नाबालिगों की थी। सामाजिक संगठनों का कहना है कि कई मामलों में लापता लड़कियों को बाद में घरेलू काम, जबरन मजदूरी या शादी के लिए दूसरे राज्यों में भेज दिया जाता है।
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विशेषज्ञों की चेतावनी
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर गांव स्तर पर शिक्षा, रोजगार और निगरानी व्यवस्था मजबूत नहीं की गई तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है.
जरूरी कदम
-गांव स्तर पर निगरानी समितियां
-मानव तस्करी के खिलाफ विशेष अभियान
-स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम
-पलायन करने वाले परिवारों का डेटा

