New Delhi/Ranchi: सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति को लेकर चल रही देरी और ढुलमुल रवैये पर सख्त रुख अपनाया है. मुख्य न्यायाधीश (सीजीआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को हुए सुनवाई के दौरान पंजाब और पश्चिम बंगाल सरकारों की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणियां कीं और स्पष्ट किया कि प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का पालन अनिवार्य है.

पंजाब सरकार को अवमानना का नोटिस
अदालत ने पंजाब सरकार द्वारा डीजीपी की नियुक्ति के लिए यूपीएससी पैनल के सुझावों को न मानने पर कड़ी नाराजगी जताई. सीजीआई सूर्यकांत ने कहा,अगर आपके पास प्रकाश सिंह फैसले के अनुरूप कोई वैध कानून नहीं है, तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही लागू रहेगा. आप किसी ‘एक्स्ट्रा कॉन्स्टिट्यूशनल नियम की आड़ लेकर कोर्ट के आदेश की अनदेखी नहीं कर सकते. सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब राज्य को कारण बताओ नोटिस जारी किया है. राज्य को अब यह साबित करना होगा कि यूपीएससी द्वारा सुझाए गए नामों को मंजूरी न देने पर उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए.
पश्चिम बंगाल पर CJI का कटाक्ष, DGP को राज्यसभा भेजने में बिजी है सरकार
सुनवाई के दौरान जब सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने पश्चिम बंगाल की रिपोर्ट यूपीएससी को सौंपने की बात कही, तो सीजीआई
ने राज्य सरकार की राजनीतिक सक्रियता पर चुटकी ली. सीजीआई ने कह
पश्चिम बंगाल राज्य अपने डीजीपी को राज्यसभा भेजने में बहुत व्यस्त है. अब चूंकि राज्यसभा में कोई वैकेंसी नहीं बची है, तो हम उम्मीद कर सकते हैं कि वहां एक स्टेबल डीजीपी।की नियुक्ति होगी.
तमिलनाडु के खिलाफ अवमानना मामला बंद
तमिलनाडु सरकार के लिए राहत की खबर रही. सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी और पी. विल्सन ने राज्य का पक्ष रखते हुए कोर्ट को आश्वासन दिया कि प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.राज्य ने बताया कि योग्य अधिकारियों के नामों का प्रस्ताव यूपीएससी को भेज दिया गया है. प्रकाश सिंह गाइडलाइंस के तहत नामों का पैनल तैयार करने के लिए 20 मार्च को एम्पैनलमेंट कमेटी की बैठक होगी. इस संतोषजनक प्रगति को देखते हुए कोर्ट ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव के खिलाफ चल रही अवमानना याचिका को बंद कर दिया.
क्या है प्रकाश सिंह फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ मामले में पुलिस सुधारों के लिए निर्देश दिए थे. इसके तहत डीजीपी की नियुक्ति पूरी तरह योग्यता के आधार पर और पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए. राज्य सरकार को यूपीएससी को नामों की लिस्ट भेजनी होती है, जिनमें से यूपीएससी तीन नाम शॉर्टलिस्ट करता है. डीजीपी का कार्यकाल कम से कम दो साल निश्चित होना चाहिए ताकि वे बिना राजनीतिक दबाव के काम कर सकें.

