पलामू: जिला अपनी सादगी और प्राकृतिक छटा के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन पिछले दो दशकों से नशे के सौदागरों ने इस धरती को अपनी काली कमाई का अड्डा बना लिया है. यहां की फिजाओं में अब फूलों की खुशबू नहीं, बल्कि अफीम का जहर घुल रहा है. माफियाओं ने भोले-भाले ग्रामीणों को लालच और डर के जाल में फंसाकर उन्हें अफीम की खेती के दलदल में धकेल दिया है, जो अब पूरे जिले के लिए एक नासूर’ बनता जा रहा है. हैरानी की बात यह है कि पुलिस की कड़ाई के बावजूद अफीम की खेती का दायरा घटने के बजाय बढ़ता जा रहा है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले वर्ष लगभग 674 एकड़ भूमि पर लगी अफीम की फसल को नष्ट किया गया था. इस वर्ष अब तक 200 एकड़ से अधिक की फसल नष्ट की जा चुकी है. इसके बाद भी मनातू, पांकी, लेस्लीगंज, तरहसी, नावाबाजार, छतरपुर, नौडीहाबाजार और हरिहरगंज जैसे प्रखंडों में करीब 1000 एकड़ से अधिक भूमि पर अफीम की फसल लहलहा रही है.इसमें से अधिकांश खेती वन भूमि या सरकारी जमीन पर की जा रही है, ताकि पकड़े जाने पर किसी व्यक्ति विशेष पर आंच न आए.

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सूखता शरीर और नष्ट होता भविष्य:
अफीम की खेती न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह ग्रामीणों के स्वास्थ्य को दीमक की तरह चाट रही है.
अफीम के फल में चीरा लगाते समय निकलने वाली गंध इतनी घातक होती है कि इससे महिलाओं का गर्भपात होने की पूरी संभावना रहती है. इस जानलेवा काम में बच्चों को भी लगाया जा रहा है, जिससे उनका शारीरिक विकास रुक गया है. अफीम की खेती में लगे पुरुषों और बच्चों का शरीर सूखता जा रहा है. हालत यह है कि वे अब कुएं से एक बाल्टी पानी खींचने की शारीरिक क्षमता भी खो चुके हैं.
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अफीम की खेती के पीछे पैसों का एक बड़ा खेल है:
अफीम की खेती के पीछे पैसों का एक बड़ा खेल है, जिसमें किसान सबसे निचली पायदान पर है और माफिया मालामाल हो रहे हैं. ऐसे समझे आंकड़े को एक एकड़ में औसतन 2 से 4 किलो कच्चा अफीम निकलता है. स्थानीय सौदागर किसानों से 60 से 80 हजार रुपये प्रति किलो में अफीम खरीदते हैं. अगर किसान खुद शहर जाकर जोखिम उठाए, तो उसे एक लाख रुपये तक मिलते हैं. यही अफीम जब राज्यों की सीमा पार करती है, तो इसकी कीमत 3 से 4 लाख रुपये प्रति किलो हो जाती है.बड़े माफिया इसी कच्चे माल से कोकीन और हेरोइन जैसे घातक ड्रग्स बनाते हैं, जिसकी कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में करोड़ों में पहुंच जाती है.

