विनीत आभा उपाध्याय

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने हाल ही में हिरासत में होने वाली मौतों को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पुलिस या जेल की हिरासत में अगर किसी की मौत होती है, कोई लापता होता है या दुष्कर्म का मामला सामने आता है, तो उसकी न्यायिक जांच कराना अनिवार्य है.
दरअसल झारखंड हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें मांग की गई है कि कानून के मुताबिक हिरासत में हुई हर मौत की जांच एक मजिस्ट्रेट द्वारा की जानी चाहिए. इस जनहित याचिका पर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम एस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की बेंच सुनवाई कर रही है. सुनवाई के दौरान राज्य सरकार द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे में यह बात सामने आई कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच झारखंड में कुल 437 लोगों की हिरासत में मौत हुई है.
अदालत ने पाया कि सरकार ने यह तो बताया कि मौतें हुई हैं, लेकिन यह साफ नहीं किया कि इनमें से कितने मामलों में स्वतंत्र न्यायिक जांच करवाई गई. कोर्ट ने कहा कि पुलिस की अपनी जांच के अलावा एक स्वतंत्र न्यायिक मजिस्ट्रेट की जांच जरूरी है, ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका न रहे.
सरकार ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि 437 मौतों में से कितनी मौतों की असल वजह न्यायिक जांच से तय हुई और कितनी सिर्फ पुलिस रिपोर्ट पर आधारित थीं. कोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्या इन मामलों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिशा-निर्देशों का पालन किया गया है या नहीं.
अदालत ने गृह सचिव को सख्त निर्देश दिए हैं कि 13 मार्च 2026 तक एक नया और विस्तृत शपथपत्र जमा करना होगा. इस शपथपत्र में बताना होगा कि किन मामलों में न्यायिक जांच हुई और किनमें नहीं. नए कानून BNSS के नियमों का पालन किस तरह किया जा रहा है, इसकी जानकारी भी देनी होगी. इस मामले पर अब 19 मार्च 2026 को दोबारा सुनवाई होगी.

