NEWS DESK: चैत्र नवरात्र का चौथा दिन मां कूष्मांडा को समर्पित होता है. उन्हें मां दुर्गा का चौथा रूप माना जाता है.मान्यता है कि मां कूष्मांडा ने अपनी हल्की सी मुस्कान से इस पूरे ब्रह्मांड की रचना की थी, इसलिए उन्हें सृष्टि की शक्ति भी कहा जाता है.


मान्यता है कि इस दिन लोग अगर सच्चे मन से मां की पूजा करते हैं और उनसे सुख, शांति और अच्छी सेहत की कामना करते हैं, तो उनके जीवन में सुख समृद्धि आती है. आइए जानते है इस दिन से जुड़ी खास बातें.
मां कूष्मांडा का दिव्य स्वरूप और महत्व
मां कूष्मांडा को अष्टभुजा देवी के रूप में पूजा जाता है. वे सिंह पर सवार रहती हैं और उनकी आठ भुजाएं होती हैं. हाथों में कमंडल, धनुष-बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र और गदा धारण किए उनका स्वरूप दिव्य और शक्तिशाली माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी उपासना करने से आयु, यश, बल और अच्छी सेहत का आशीर्वाद मिलता है. मां कूष्मांडा को लाल गुड़हल, लाल कमल और बेला जैसे फूल बेहद प्रिय माने जाते हैं.
पूजा के लिए शुभ समय
- अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:04 बजे से 12:53 बजे तक
- अमृत काल: शाम 06:17 बजे से 07:46 बजे तक
मां कूष्मांडा की पूजा की आसान विधि
- सुबह उठकर स्नान करें और साफ, हल्के नारंगी रंग के कपड़े पहनें.
- पूजा शुरू करने से पहले मां कूष्मांडा का संकल्प लें.
- उनकी प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर शांत मन से ध्यान करें.
- इसके बाद विधि अनुसार मां का आह्वान करें
- मां को कमल का फूल चढ़ाएं.
- कुमकुम, अक्षत, हल्दी और चंदन अर्पित करें.
- धूप और दीप जलाकर पूजा आगे बढ़ाएं.
- मां के मंत्रों का जाप करें.
- दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय का पाठ करें.
- भोग में मालपुआ और पेठा चढ़ाएं, साथ ही दही या हलवा भी अर्पित कर सकते हैं।
- अंत में मां की आरती करें.
- पूजा के बाद मां से अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगें और परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करें.
मां कूष्मांडा मंत्र
- ॐ कूष्माण्डा देव्यै नमः॥
- या देवी सर्वभूतेषु कूष्मांडा रूप में विराजमान हैं, उन्हें बार-बार नमन है॥
देवी का खास भोग
मां कूष्मांडा को मालपुआ और पेठा चढ़ाना शुभ माना जाता है.विश्वास है कि यह भोग अर्पित करने से मां प्रसन्न होती हैं और भक्तों को स्वास्थ्य व खुशहाली का आशीर्वाद देती हैं.
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य जानकारी के तौर पर दी गई है. यहां बताए गए उपाय, मान्यताएं और सलाह विभिन्न स्रोतों जैसे पंचांग, धार्मिक ग्रंथों, ज्योतिषीय मतों और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं. पाठकों से अनुरोध है कि इसे अंतिम सत्य न मानें और किसी भी बात को अपनाने से पहले अपने विवेक का इस्तेमाल करें.यह लेख अंधविश्वास को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नहीं है.

