News Desk: अगले महीने 1 अप्रैल 2026 से नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत के साथ नौकरीपेशा लोगों की सैलरी स्लिप में बदलाव देखने को मिल सकता है. कंपनियां नए लेबर कानूनों और बजट में किए गए टैक्स बदलावों के अनुसार सैलरी स्ट्रक्चर अपडेट कर रही हैं. हालांकि कंपनियों की कोशिश यही है कि कर्मचारियों की टेक-होम सैलरी ज्यादा प्रभावित न हो, लेकिन टैक्स देने के तरीके और कुल गणना में बदलाव संभव है.

क्या है नया नियम?
इस बार सबसे बड़ा बदलाव ‘वेजेज’ यानी वेतन की नई परिभाषा को लेकर किया गया है. नए नियम के अनुसार, किसी भी कर्मचारी की कुल सैलरी का कम से कम 50% हिस्सा बेसिक सैलरी और उससे जुड़े घटकों में होना जरूरी है. इस बदलाव के चलते कंपनियां बेसिक सैलरी को बढ़ा सकती हैं और अन्य अलाउंसेस (जैसे स्पेशल अलाउंस) को घटा या मर्ज कर सकती हैं. इससे भविष्य निधि (PF) और ग्रेच्युटी जैसी सुविधाओं में बढ़ोतरी होगी, लेकिन हाथ में मिलने वाली सैलरी पर हल्का असर पड़ सकता है.
सैलरी स्ट्रक्चर में क्या बदलाव आएंगे?
सैलरी स्ट्रक्चर को सरल बनाने की दिशा में एक और बड़ा बदलाव सामने आ रहा है नया टैक्स रिजीम अब डिफॉल्ट विकल्प बनता जा रहा है. इसका मतलब है कि यदि कोई कर्मचारी खुद से पुराना टैक्स सिस्टम नहीं चुनता, तो उसे स्वतः नए टैक्स रिजीम में शामिल कर दिया जाएगा. नए रिजीम में टैक्स दरें कम होती हैं, लेकिन इसमें मिलने वाली छूट और डिडक्शन सीमित या खत्म हो जाते हैं, जिससे यह सिस्टम ज्यादा आसान और सीधा बन जाता है.
क्या पुराना टैक्स रिजीम खत्म हो गया है?
ऐसा बिल्कुल नहीं है. पुराना टैक्स रिजीम अभी भी लागू है और कई लोगों के लिए फायदेमंद भी हो सकता है. खासकर वे लोग जिनकी सालाना आय 10 से 30 लाख रुपये के बीच है, जो मेट्रो शहरों में रहते हैं, ज्यादा किराया देते हैं या होम लोन चुका रहे हैं, और 80C व NPS जैसी योजनाओं में निवेश करते हैं, वे पुराने टैक्स सिस्टम में अधिक टैक्स बचा सकते हैं.
किसके लिए कौन सा विकल्प बेहतर?
जिन कर्मचारियों के पास ज्यादा टैक्स डिडक्शन नहीं हैं या जिनका सैलरी स्ट्रक्चर पहले से ही सरल है, उनके लिए नया टैक्स रिजीम ज्यादा सुविधाजनक और झंझट-मुक्त साबित हो सकता है. वहीं फ्रीलांसर और कंसल्टेंट जैसे पेशेवर भी आमतौर पर नए टैक्स सिस्टम को पसंद करते हैं, क्योंकि इसमें कागजी प्रक्रिया और टैक्स प्लानिंग कम करनी पड़ती है.

