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दिव्यांगों के अधिकारों पर झारखंड हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय, सर्विस मैटर होने के बावजूद PIL के रूप में होगी सुनवाई

विनीत आभा उपाध्याय ​रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट...

"A mother's love is paramount": High Court sets aside Family Court order, grants child's custody to the mother.

विनीत आभा उपाध्याय

​रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम. एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने दिव्यांगता प्रमाणपत्रों के प्रारूप से संबंधित एक याचिका को जनहित याचिका (PIL) के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया है.

तकनीकी आधार पर सुनवाई से इनकार नहीं: कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि मामला दिव्यांगों के अधिकारों से जुड़ा है तो तकनीकी आधार पर उसे सुनने से इनकार नहीं किया जा सकता. यह मामला झारखंड सरकार के संकल्प संख्या 2249 (दिनांक 3 अप्रैल 2018) से संबंधित है. याचिकाकर्ता के मुताबिक इस अधिसूचना में दिव्यांगता प्रमाणपत्र के लिए जो विशेष प्रारूप अनिवार्य किया गया है, वह दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों के विरुद्ध है.

व्यक्तिगत याचिका से बना जनहित का मुद्दा

याचिकाकर्ता ने पहले व्यक्तिगत रूप से एक याचिका दायर की थी क्योंकि उन्हें इसी प्रारूप में प्रमाणपत्र न होने के कारण एक चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया था. सुनवाई के दौरान JPSC के अधिवक्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि आमतौर पर सर्विस मैटर में जनहित याचिका स्वीकार नहीं की जाती है.

दिव्यांगों के मामलों में संवेदनशीलता जरूरी: हाईकोर्ट

लेकिन कोर्ट ने कहा कि दिव्यांगों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को बढ़ी हुई संवेदनशीलता के साथ देखने की जरूरत है.सिर्फ इसलिए कि याचिकाकर्ता को इस केस से व्यक्तिगत लाभ मिल सकता है अदालत उस वर्ग के अधिकारों की अनदेखी नहीं कर सकती जो आसानी से अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकते. अदालत ने माना कि इस मुद्दे पर स्पष्टता आने से दिव्यांग व्यक्तियों को अपनी स्थिति समझने में मदद मिलेगी और भविष्य की नियुक्तियों में पारदर्शिता आएगी.

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हजारों दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए राहत की खबर

इस केस से जुड़े सभी पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने यह निर्देश दिया कि इस याचिका को जनहित याचिका के रूप में सूचीबद्ध किया जाए. यह निर्णय उन हजारों दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए उम्मीद की किरण है जो अक्सर जटिल प्रशासनिक नियमों और प्रमाणपत्रों के प्रारूप के कारण सरकारी नौकरियों के अवसरों से वंचित रह जाते हैं.

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