Ranchi: झारखंड की उभरती अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे में सुधार के दावों के बीच एक ऐसी हकीकत सामने आई है, जो राज्य के भविष्य यानी हमारे बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर सवाल खड़े करती है. सरकार के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में बच्चों का विकास उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पा रहा है. स्टंटिंग (नाटापन) से लेकर एनीमिया (खून की कमी) तक, झारखंड के बच्चे राष्ट्रीय औसत की तुलना में अधिक संघर्ष कर रहे हैं.
राष्ट्रीय औसत से कोसों दूर है झारखंड
सर्वेक्षण के अनुसार, झारखंड में बच्चों के पोषण का स्तर देश के अन्य हिस्सों की तुलना में चिंताजनक है. इसे तीन मुख्य पैमानों पर समझा जा सकता है. झारखंड में 39.6 फीसदी बच्चों की लंबाई उनकी उम्र के हिसाब से कम है, जबकि राष्ट्रीय औसत 35.5 फीसदी है. राज्य के 39.4 फीसदी बच्चे कम वजन की समस्या से जूझ रहे हैं, जो देश के औसत 32.1 फीसदी से काफी ज्यादा है. ऊंचाई के अनुपात में कम वजन के मामले में झारखंड 22.4 फीसदी पर है, जबकि भारत का औसत 19.3 फीसदी है.
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10 में से 7 बच्चों में खून की कमी
सबसे डराने वाला आंकड़ा एनीमिया का है. 6 से 59 महीने की उम्र के 67.5 फीसदी बच्चे एनीमिया यानी खून की कमी के शिकार हैं. राज्य के भीतर ही अलग-अलग जिलों में पोषण की स्थिति में भारी अंतर है. आहार विविधता जहां रांची, धनबाद और बोकारो जैसे 12 जिलों में यह स्कोर 8.0 से ऊपर है, वहीं सिमडेगा जैसे पिछड़े जिलों में यह महज 5.85 से 6.4 के बीच सिमट गया है. रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम सिंहभूम, पाकुड़ और सिमडेगा में बच्चों के विकास अवरुद्ध होने और कम वजन के मामले सबसे अधिक पाए गए हैं.
क्या कर रही है सरकार
मिलेट मिशन: गुमला जैसे जिलों में रागी (मडुआ) को आंगनवाड़ी केंद्रों के खाने में शामिल किया गया है, जिसके लिए गुमला को पीएम अवार्ड भी मिला है.
फोर्टिफाइड राइस: एनीमिया से लड़ने के लिए सभी जिलों में पोषक तत्वों से भरपूर चावल का वितरण शुरू किया गया है.
सक्षम आंगनवाड़ी: 6,000 से अधिक केंद्रों को आधुनिक बनाया जा रहा है ताकि पोषण वितरण प्रणाली को बेहतर किया जा सके.
