Ranchi: झारखंड में गिद्धों को बचाने का सरकारी संकल्प केवल कागजी बनकर रह गया है. राज्य की राजधानी के करीब ओरमांझी (मुटा) में करोड़ों की लागत से बना गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र वर्षों से गिद्धों का इंतज़ार कर रहा है. गिद्धों के लिए बनाए गए इस केंद्र में अब तक एक भी गिद्ध ने कदम नहीं रखा है.
गिद्धों की वर्तमान स्थिति और आंकड़े
झारखंड में गिद्धों की स्थिति बेहद नाजुक है. ताजा आंकड़ों के अनुसार राज्य में मात्र 248 गिद्ध ही बचे हैं, जो मुख्य रूप से हजारीबाग, कोडरमा, चौपारण और खूंटी क्षेत्रों में देखे गए हैं. हालांकि 2026 तक इनकी कोई सटीक और ताजा सरकारी गणना सार्वजनिक नहीं है, लेकिन वन विभाग के अफसरों के अनुसार गिद्धों के निवास स्थान के विनाश और डिक्लोफेनाक जैसी जहरीली दवाओं के अनियंत्रित उपयोग के कारण इनकी संख्या चिंताजनक रूप से कम हुई है.
संरक्षण के नाम पर क्या हो रहा है
झारखंड वन विभाग ने बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के साथ एक पांच वर्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं. इस साझेदारी का उद्देश्य ओरिएंटल व्हाइट-बैक्ड और लॉन्ग-बिल्ड गिद्धों की लुप्तप्राय प्रजातियों का वैज्ञानिक तरीके से प्रजनन करना है. साथ ही गिद्धों की आबादी की निगरानी और उनके स्वास्थ्य प्रबंधन पर भी काम किया जाना है. इस पर संस्था तकनीकी सहायता प्रदान करेगी.
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गिद्धों के संरक्षण में खर्च हो गए 10 करोड़
गिद्ध संरक्षण पर अब तक लगभग 10 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं. ओरमांझी के मुटा स्थित प्रजनन केंद्र के निर्माण और इसके रखरखाव पर पिछले 10 साल में यह राशि खर्च की गई है. धरातल पर केंद्र की निष्क्रियता ने इन खर्चों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
