Saraikela: झारखंड में लगातार बढ़ रहे मानव-हाथी संघर्ष के पीछे की सबसे बड़ी वजह सामने आई है – हाथियों के परंपरागत आवागमन पथ यानी हाथी कॉरिडोर में बड़े पैमाने पर हुए निर्माण कार्य.
क्या है हाथी कॉरिडोर..?
हाथियों के परंपरागत आवागमन पथ को हाथी कॉरिडोर के तौर पर जाना जाता है. यह कॉरिडोर अयोध्या हिल से लेकर दलमा पहाड़ और वहां से सारंडा जंगल तक जाता है. हाथी पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसी रास्ते से आना-जाना करते हैं.

विकास ने रोका रास्ता
परन्तु इस कॉरिडोर के बीच कई बड़े निर्माण कार्य किए गए हैं. अयोध्या पहाड़ पर हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट, दलमा पहाड़ के पास चांडिल डैम और सारंडा जंगल में किरीबुरु माइंस जैसे प्रोजेक्टों ने हाथियों के निवास स्थान और उनके आवागमन को गंभीर रूप से बाधित कर दिया है. यह तथाकथित विकास अब मानव जीवन के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर रहा है.

300 साल तक याद रहता है रास्ता
वन विशेषज्ञों का कहना है कि एक हाथी यदि 100 साल तक जीवित रहता है, तो उसकी तीन पीढ़ियां यानी लगभग 300 साल तक वही रास्ता अपनाती हैं. यह मार्ग उनकी स्थायी स्मृति का हिस्सा बन जाता है. ऐसे में जब रास्ता अवरुद्ध होता है, तो हाथी भटककर गांवों में प्रवेश कर जाते हैं और संघर्ष की स्थिति बनती है.
वन विभाग ने भी माना कारण
चांडिल वन क्षेत्र के वनपालों ने स्वीकार किया है कि हाथियों के परंपरागत निवास स्थान का स्थानांतरण ही मानव-हाथी संघर्ष का सबसे बड़ा कारण है. चांडिल फॉरेस्ट रेंज लंबे समय से संवेदनशील क्षेत्र बना हुआ है और यहां कई बार जान-माल का भारी नुकसान हो चुका है.

प्रशासन के सामने सवाल
- जब कॉरिडोर पहले से चिन्हित था तो बड़े प्रोजेक्ट को अनुमति कैसे मिली..?
- दलमा क्षेत्र में पानी और भोजन की वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई..?
- कॉरिडोर को अतिक्रमण मुक्त करने की प्रक्रिया कब शुरू होगी..?
- क्या 300 साल पुराने रास्तों को रोककर स्थायी समाधान संभव है..?
ग्रामीणों की मांग
हाड़ात गांव में हालिया घटना में दो लोगों की मौत और तीन के गंभीर घायल होने के बाद ग्रामीणों में भारी आक्रोश है. ग्रामीणों का कहना है कि दलमा गज परियोजना के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन हाथियों के पलायन को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं.

समाधान की दिशा में सुझाव
ग्रामीणों ने मांग की है कि हाथी कॉरिडोर को अतिक्रमण मुक्त किया जाए. दलमा क्षेत्र में तालाब और घास के मैदान विकसित किए जाएं ताकि हाथियों को पर्याप्त भोजन और पानी मिल सके. उनका कहना है कि तभी मानव और गजराज दोनों की सुरक्षा संभव है.
विकास बनाम अस्तित्व की बहस
स्थानीय लोगों का मानना है कि अनियोजित विकास ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है. हाथी स्वभाव से संवेदनशील प्राणी हैं, लेकिन बदलती परिस्थितियों ने उन्हें आक्रामक बना दिया है. यदि समय रहते संतुलित विकास पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में यह संकट और गहरा सकता है.
