News Desk: ईरान के रणनीतिक रूप से अहम चाबहार पोर्ट को लेकर भारत एक संवेदनशील कूटनीतिक दौर से गुजर रहा है. अमेरिका द्वारा दी गई छह महीने की प्रतिबंध छूट, जो नवंबर 2025 से लागू थी, अब समाप्ति के करीब है. ऐसे में भारत सरकार अपनी मौजूदगी बनाए रखते हुए कानूनी और वैश्विक दबावों से बचने के विकल्प तलाश रही है.
प्रतिबंध छूट खत्म होने से बढ़ी चुनौती
बदलते वैश्विक हालात के बीच भारत चाबहार में अपनी रणनीति को लचीला बनाने पर विचार कर रहा है, ताकि प्रतिबंधों के प्रभाव से बचा जा सके और परियोजना पर दीर्घकालिक नियंत्रण भी बना रहे.
सूत्रों के अनुसार, भारत चाबहार पोर्ट से पूरी तरह बाहर निकलने के पक्ष में नहीं है. करीब 120 मिलियन डॉलर के निवेश के साथ यह पोर्ट भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी रणनीति का अहम हिस्सा है. यह न केवल अफगानिस्तान बल्कि मध्य एशिया तक व्यापारिक पहुंच का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जो पाकिस्तान को दरकिनार कर सीधा मार्ग उपलब्ध कराता है.
हिस्सेदारी ट्रांसफर का विकल्प
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत एक तकनीकी समाधान के तौर पर अपनी हिस्सेदारी को अस्थायी रूप से किसी ईरानी कंपनी को ट्रांसफर करने पर विचार कर सकता है. इस कदम का उद्देश्य प्रतिबंधों की समयसीमा के दौरान कानूनी जटिलताओं से बचना है, जबकि भविष्य में हालात अनुकूल होने पर दोबारा नियंत्रण हासिल करने की संभावना बनी रहेगी.
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि चाबहार परियोजना के लिए उसकी वित्तीय प्रतिबद्धताएं पूरी हो चुकी हैं. 2026-27 के बजट में इसके लिए कोई नया प्रावधान नहीं किया गया है. साथ ही, इस मुद्दे पर अमेरिका और ईरान दोनों के साथ भारत की बातचीत जारी है.
रणनीतिक दृष्टि से अहम है चाबहार
चाबहार पोर्ट भारत के लिए सिर्फ एक व्यापारिक केंद्र नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संपत्ति भी है. यह होर्मुज जलडमरूमध्य के पास स्थित है, जिससे क्षेत्रीय गतिविधियों पर नजर रखना संभव होता है. साथ ही, यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट पर चीन की बढ़ती मौजूदगी के संतुलन के रूप में भी देखा जाता है.
