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चाईबासा: सारंडा में नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक जंग शुरू, नक्सलियों को कोबरा जवानों ने घेरा.

चाईबासा: जिले के सारंडा वन क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा और निर्णायक अभियान छेड़...

चाईबासा: जिले के सारंडा वन क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा और निर्णायक अभियान छेड़ दिया है. चिड़िया खदान इलाके में हुए एक आईईडी ब्लास्ट के बाद सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई करते हुए नक्सलियों को चारों ओर से घेर लिया है. मारांगपोंगा के घने जंगलों में सुरक्षा बलों और भाकपा माओवादी के बीच भीषण मुठभेड़ हुई थी, जिसमें नक्सलियों को भारी क्षति पहुंचने की सूचना है.

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आईईडी ब्लास्ट फिर शुरू हुआ ऑपरेशन क्लीन घटनाक्रम की शुरुआत:

एक मार्च की सुबह करीब 5 बजे हुई. चिड़िया ओपी क्षेत्र के अंतर्गत चिड़िया खदान इलाके में सर्च ऑपरेशन के दौरान नक्सलियों द्वारा बिछाए गए एक लैंडमाइन की चपेट में आने से कोबरा 209 बटालियन के सहायक कमांडेंट अजीत मल्लिक घायल हो गए. उनके पैर में गंभीर चोट आई, जिसके बाद उन्हें तत्काल एयरलिफ्ट कर रांची के अस्पताल भेजा गया.
हालांकि, नक्सलियों की इस हरकत ने सुरक्षा बलों के हौसले पस्त करने के बजाय उन्हें और आक्रामक बना दिया. ब्लास्ट के कुछ ही देर बाद, कोबरा 209 बटालियन, सीआरपीएफ और जिला पुलिस की संयुक्त टीम ने सटीक इंटेलिजेंस के आधार पर छोटानागरा-जराइकेला सीमावर्ती मारांगपोंगा जंगल की घेराबंदी कर दी. कोबरा जवानों की सटीक और घातक फायरिंग के सामने नक्सली टिक नहीं पाए. मारांगपोंगा के जंगलों में जैसे ही मुठभेड़ शुरू हुई, नक्सलियों के दस्ते में भगदड़ मच गई.सूत्रों के अनुसार, कई नक्सली अपने हथियार और सामान छोड़कर घने जंगलों की ओर भागते देखे गए हैं. सुरक्षा बलों ने घेरो और दबाव बनाओ की रणनीति अपनाते हुए जंगल के हर निकास द्वार को सील कर दिया है. पूरे इलाके की निगरानी ड्रोन और आधुनिक संचार उपकरणों से की जा रही है ताकि कोई भी नक्सली घेरा तोड़कर भाग न सके.

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ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए जान जोखिम में डाल रहे जवान:

नक्सलियों ने पूरे सारंडा क्षेत्र में सैकड़ों आईईडी बिछा रखे हैं.इनका उद्देश्य न केवल सुरक्षा बलों को रोकना है, बल्कि स्थानीय आदिवासियों के मन में खौफ पैदा करना भी है ताकि वे जंगल जाने से डरें. सुरक्षा बल लगातार इन बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय कर रहे हैं ताकि, ग्रामीण बिना डरे लकड़ी, पत्ता और महुआ चुनने जंगल जा सकें.
एक दौर था जब सारंडा को नक्सलियों का अभेद्य किला माना जाता था, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है.

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