सरायकेला: झारखंड में हाथी समस्या बनी बड़ी चुनौती, मानव-हाथी संघर्ष पर उठ रहे गंभीर सवाल

संवाददाता सरायकेला से विजय कुमार गोप Saraikela : झारखंड में हाथी समस्या यानी मानव-हाथी संघर्ष हाल के कुछ दिनों में बहुत ही...

संवाददाता सरायकेला से विजय कुमार गोप

Saraikela : झारखंड में हाथी समस्या यानी मानव-हाथी संघर्ष हाल के कुछ दिनों में बहुत ही चर्चा का विषय बन गया है. यूँ तो मानव-हाथी संघर्ष को झारखंड सरकार ने एक आपदा के रूप में वर्गीकृत किया है, मगर इसे प्राकृतिक आपदा माना जाए या फिर इसे मानव जनित आपदा माना जाए, इस संबंध में अभी भी मतभेद है. सरकार इसे एक प्राकृतिक आपदा मानते हुए इससे बचाव हेतु कई सारे उपाय और सावधानी के साथ ही आत्मरक्षा हेतु बम-पटाखे फोड़ने इत्यादि व्यवस्था को समाधान के रूप में ले रही है, मगर इन सभी उपायों के बाद भी हाथी समस्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है.

लगातार बढ़ रहा मौत का आंकड़ा

झारखंड के कोल्हान क्षेत्र में पिछले दो-तीन महीनों में एक दतैल हाथी द्वारा मानव-हाथी संघर्ष में लगभग 25 लोगों की असामयिक मौत के कुछ ही महीनों बाद इचागढ़ के हाड़ात गांव में एक ही परिवार के चार लोगों को चपेट में लेने से पूरे झारखंड में यह एक राजनीतिक मुद्दा बनकर उभरा है, सरायकेला-खरसावां, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम और खूंटी जिलों में दलमा, चांडिल, ईचागढ़, नीमडीह और राजनगर के गांव हर हफ्ते हाथियों के हमले झेल रहे हैं. फसल बर्बादी, घर टूटना और जनहानि अब आम बात हो गई है.

क्या है असली वजह?

असल में अगर देखा जाए तो हाथी समस्या के मुद्दे को राजनीतिक रूप से ही सुलझाया जा सकता है. जब तक हाथी समस्या के मुद्दे को विधानसभा में ठोस दलील के साथ पेश नहीं किया जाएगा, तब तक सिर्फ मुआवजा बांटना समाधान नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरी तरह मानव जनित आपदा है, जंगलों की अंधाधुंध कटाई, खनन, अतिक्रमण और हाथी कॉरिडोर में रिहायशी व औद्योगिक गतिविधियों ने हाथियों को आबादी की ओर धकेला है. दलमा अभयारण्य में भोजन-पानी की कमी और गर्मी में जलस्रोत सूखने से हाथी भोजन की तलाश में गांवों तक आ जाते हैं.

माधान क्या हो?

  • कॉरिडोर बहाली:* पुराने हाथी कॉरिडोर को अतिक्रमण मुक्त कर वहां वनीकरण किया जाए.
  • वाटर होल और चारा:* अभयारण्यों में सालभर पानी और चारे की व्यवस्था हो ताकि हाथी बाहर न निकलें.
  • अर्ली वार्निंग सिस्टम:* रेडियो कॉलर, ड्रोन और ट्रैकर दल से ग्रामीणों को समय पर अलर्ट मिले.
  • स्थायी सुरक्षा:* प्रभावित गांवों में सोलर फेंसिंग, ट्रेंच और बायो-फेंसिंग की जाए.
  • नीति में बदलाव:* मुआवजा राशि बढ़ाई जाए और 24 घंटे में भुगतान हो, साथ ही हाथी प्रभावित क्षेत्रों को विशेष आपदा जोन घोषित कर अलग बजट दिया जाए.

हाथी झारखंड का राजकीय पशु है. इसे मारना समाधान नहीं. लेकिन इंसानी जान की कीमत पर भी संरक्षण नहीं हो सकता. सरकार, वन विभाग, जनप्रतिनिधि और ग्रामीणों को मिलकर दीर्घकालिक योजना बनानी होगी, वरना यह संघर्ष और विकराल होगा.

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