Prashant Sharma

Hazaribagh : प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक विरासत के साथ ही हजारीबाग की पहचान अब विकसित प्राचीन सभ्यता से भी जुड़ गयी है. जो जिला में चर्चा का विषय है. चौपारण प्रखंड के मोहाने नदी घाटी क्षेत्र में हुई वैज्ञानिक जांच और पुरातात्विक खोजों ने इस संभावना को मजबूत कर दिया है कि यहां हजारों वर्ष पुरानी विकसित शहरी सभ्यता मौजूद थी. पुरात्तववेताओं का दावा है कि यह बसावट करीब 3200 वर्षों से भी अधिक पुरानी हो सकती है. इस क्षेत्र में मिले प्राचीन मिट्टी के बर्तन, विशाल रिंग वेल, बौद्ध प्रतिमाएं, पत्थर के औजार और ईंटों के अवशेष यह दर्शाते हैं कि यह इलाका कभी सांस्कृतिक, धार्मिक और शहरी गतिविधियों का बड़ा केंद्र रहा होगा. विशेषज्ञों के अनुसार यह सभ्यता पाषाण युग से लेकर मध्यकाल तक लगातार विकसित होती रही.
पाषाण युग से मध्यकाल तक बसावट के संकेत
शोधकर्ताओं के मुताबिक चौपारण क्षेत्र में मानव बसावट की शुरुआत लगभग 1200 ईसा पूर्व मानी जा रही है. शुरुआती दौर में यहां पत्थर के औजारों का इस्तेमाल होता था. बाद में लौह युग के दौरान यहां शहरी संस्कृति विकसित हुई. जिसके प्रमाण विशेष प्रकार के मिट्टी के बर्तनों और संरचनाओं से मिलते हैं. करीब 300 ईसा पूर्व के दौरान यहां विकसित जल प्रबंधन प्रणाली के संकेत भी मिले हैं. इसके बाद गुप्त और पाल काल में यह क्षेत्र धार्मिक गतिविधियों का केंद्र बन गया. यहां से मिली बौद्ध प्रतिमाएं और धार्मिक अवशेष इसका संकेत देती है.
प्राचीन रिंग वेल ने विशेषज्ञों को चौंकाया

आईआईटी खड़गपुर से जुड़े शोधकर्ता शशि शेखर के अनुसार यहां मिले रिंग वेल अत्यंत उन्नत इंजीनियरिंग तकनीक का उदाहरण हैं. लगभग 15 मीटर गहरे इन कुओं में गोलाकार ईंटों का इस्तेमाल किया गया है, जो उस दौर की वैज्ञानिक सोच और भूमिगत जल प्रबंधन प्रणाली को दर्शाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की संरचनाएं सामान्य ग्रामीण बसावट का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि विकसित शहरी केंद्रों की पहचान मानी जाती हैं. मौर्यकालीन नगरों में इस तरह के कुएं विशेष रूप से पाए जाते थे.
बौद्ध विरासत के मजबूत प्रमाण

चौपारण के दाइहार, बच्छई, बसरिया और आसपास के गांवों से मिली बौद्ध प्रतिमाओं और धार्मिक अवशेषों ने इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ा दिया है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद विष्णुकांत के अनुसार यहां से प्राप्त मूर्तियां, शिलालेख और टेराकोटा अवशेष यह साबित करते हैं कि यह क्षेत्र कभी समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र था. उन्होंने बताया कि यहां मिले अवशेषों का संबंध मौर्य, गुप्त और पाल काल से जुड़ता दिखाई देता है. इससे यह भी संकेत मिलता है कि यह इलाका बौद्ध धर्म के प्रसार का महत्वपूर्ण केंद्र रहा होगा.
वैज्ञानिक खुदाई की मांग तेज

पुरातत्वविदों का कहना है कि अभी तक केवल सतही सर्वेक्षण और सीमित अध्ययन ही हुआ है. यदि यहां वैज्ञानिक तरीके से व्यापक खुदाई कराई जाएं, तो पूर्वी भारत के इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथय सामने आ सकते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि जमीन के नीचे अब भी कई प्राचीन संरचनाएं, धार्मिक स्थल और नगर बसावट के अवशेष दबे हो सकते हैं. यही वजह है कि इस क्षेत्र के संरक्षण और पुरातात्विक खुदाई की मांग लगातार उठ रही है.
तस्वीरों में दिखी हजारों साल पुरानी विरासत
सर्वेक्षण के दौरान दाइहार गांव में पुरातत्वविदों की टीम ने कई महत्वपूर्ण स्थलों का निरीक्षण किया. कुओं से निकाली गई प्राचीन मूर्तियां, टूटे हुए बौद्ध पैनल, तालाबों के भीतर मिले पत्थर के ढांचे और भूमिगत संरचनाओं के संकेत इस क्षेत्र की ऐतिहासिक समृद्धि की गवाही देते हैं- स्थानीय लोगों का कहना है कि गांवों में खुदाई या तालाब सफाई के दौरान अक्सर प्राचीन मूर्तियां और पुराने ईंट-पत्थर निकलते रहते हैं, लेकिन अब जाकर इन खोजों को व्यवस्थित तरीके से देखा जा रहा है-
इतिहास बदल सकती है हजारीबाग की यह खोज
इतिहासकारों का मानना है कि यदि चौपारण क्षेत्र में व्यवस्थित पुरातात्विक खुदाई शुरू होती है, तो यह खोज केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वी भारत के इतिहास को नई दिशा दे सकती है. हजारीबाग की धरती के नीचे दबी यह संभावित सभ्यता आने वाले समय में देश के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में अपनी जगह बना सकती है.
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