SAURAV SINGH

Ranchi: झारखंड में सालों से जारी नक्सलवाद अब अपने खात्मे की ओर है. सुरक्षाबलों के कड़े रुख, लगातार जारी अभियानों और सटीक रणनीति के कारण राज्य में माओवादियों की कमर टूट चुकी है. हाल के दिनों में हुई मुठभेड़ों में कई बड़े नक्सली कमांडर मारे गए हैं, वहीं भारी दबाव के चलते बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है और कई सलाखों के पीछे भेजे जा चुके हैं, लेकिन, नक्सलियों के कमजोर पड़ने के बाद भी झारखंड के जंगलों और ग्रामीण इलाकों में मौत का एक अदृश्य साया मंडरा रहा है. यह खतरा है जमीन के नीचे छिपे IED (Improvised Explosive Device) बम का नक्सली भले ही बैकफुट पर हों, लेकिन उनके द्वारा सुरक्षाबलों को निशाना बनाने के लिए जंगलों में बिछाए गए बारूदी सुरंग आज भी जवानों, स्थानीय ग्रामीणों और बेजुबान मवेशियों के लिए काल बने हुए है.
क्या झारखंड में भी छत्तीसगढ़ के तर्ज पर चलेगा अभियान
झारखंड में पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खत्म होने के कगार पर है. यहां के जंगलों में छिपाये हुए IED की बरामदगी के लिए राज्य सरकार के द्वारा अब IED मुक्त पंचायत अभियान चला रही है. पहले पंचायत की सीमाओं का चिन्हांकन किया जाएगा. फिर सर्च ऑपरेशन चलाकर सभी IED बम निकाले जाएंगे. सवाल है आने वाले दिनों में क्या झारखंड में इस तरह के अभियान को शुरू किया जाएगा.
टाइम बम की तरह हैं जमीन में दबे IED
सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, नक्सलियों ने जंगलों के रास्तों, कच्चे रास्तों, पहाड़ों, तालाबों के किनारे और यहां तक कि पेड़ों के नीचे भारी मात्रा में आईईडी प्लांट कर रखे हैं.सबसे खतरनाक बात यह है कि ये IED कई सालों तक जमीन के नीचे सुरक्षित और सक्रिय रहते है. सालों बाद भी अगर इन पर थोड़ा सा भी दबाव पड़े, तो ये भीषण विस्फोट के साथ फट जाते हैं. यही वजह है कि जंगलों को इन छिपे हुए बमों से मुक्त कराना सुरक्षाबलों के लिए इस वक्त की सबसे जटिल चुनौती बन गया है.
जवान, ग्रामीण और मवेशी, सब निशाने पर
इस अदृश्य बारूद की चपेट में आकर भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. जंगलों में सर्च ऑपरेशन के दौरान कई जवान इन IED ब्लास्ट की चपेट में आकर शहीद हो चुके हैं, जबकि दर्जनों जवानों को अपने हाथ-पैर गंवाने पड़े है. जंगल के आस-पास रहने वाले ग्रामीण, जो अपनी आजीविका (लकड़ी, महुआ, केंदू पत्ता चुनने) के लिए जंगलों में जाते हैं, अनजाने में इन बमों पर पैर रख देते हैं. हाल के दिनों में कई ग्रामीणों की इस वजह से दर्दनाक मौत हुई है और कई हमेशा के लिए दिव्यांग हो गए हैं.जंगलों में विचरण करने वाले जंगली जानवरों, विशेषकर हाथियों और ग्रामीणों के मवेशियों (गायों, बकरियों) के लिए भी यह IED साक्षात यमराज साबित हो रहे हैं. अब तक कई भारी-भरकम हाथियों की मौत इन ब्लास्ट में हो चुकी है.
सुरक्षाबलों के लिए क्यों है यह बड़ी परीक्षा ?
नक्सलियों से सीधे आमने-सामने की मुठभेड़ में सुरक्षाबल भारी पड़ रहे हैं, लेकिन IED को ढूंढना एक अलग और बेहद थका देने वाली प्रक्रिया है. इसके लिए बम निरोधक दस्ते और मेटल डिटेक्टर के सहारे जवानों को एक-एक इंच जमीन फूंक-फूंक कर नापनी पड़ती है, जिससे ऑपरेशन की रफ्तार बहुत धीमी हो जाती है. नक्सली अब ऐसे आईईडी का इस्तेमाल कर रहे हैं जिन्हें निकालने की कोशिश करते ही वे ब्लास्ट हो जाते हैं. झारखंड के बूढ़ा पहाड़, सारंडा और पारसनाथ जैसे घने जंगलों में छिपे बमों को ढूंढना काफी चुनौती का काम है.
आईईडी के निशाने पर सुरक्षाबल से लेकर ग्रामीण और पशु
– 06 अप्रैल 2026: चाईबासा के सारंडा जंगल में सर्च ऑपरेशन के दौरान सारंडा के जंगल में आईईडी ब्लास्ट में सीआरपीएफ के एक जवान घायल हुए थे.
– 21 फरवरी 2026 : सारंडा में आईईडी ब्लास्ट में दो कोबरा जवान घायल हुए थे, सर्च ऑपरेशन के दौरान यह हादसा हुआ था.
– 14 दिसंबर 2025: चाईबासा के सारंडा जंगल में आईईडी ब्लास्ट में कोबरा बटालियन के दो जवान घायल हुए थे.
– 12 अक्टूबर 2025: चाईबासा के सारंडा में आईईडी विस्फोट में घायल हथिनी की मौत हो गई थी.
– 08 अगस्त 2025: चाईबासा के सारंडा आईईडी की चपेट में आने से कोबरा बटालियन के दो जवान जख्मी हो गए थे.
– मार्च 2025: चाईबासा के छोटानागरा थाना क्षेत्र में आईईडी ब्लास्ट किया था. इसमें सीआरपीएफ के अफसर सुनील कुमार मंडल शहीद हो गए थे.
– चाईबासा के सारंडा जंगल में आईईडी के चपेट में आने से करीब 22 ग्रामीण अपनी जान गंवा चुके हैं. इनमें सात साल की बच्ची भी शामिल रही है. ग्रामीण उस वक्त हादसे के शिकार हुए हैं, जब वे लकड़ी या पत्ता लेने जंगल गए या महुआ चुनने गए थे.
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