Ranchi: राहे प्रखंड के बारूडीह गांव में आयोजित तीन दिवसीय भव्य अखंड हरि कीर्तन का समापन श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ संपन्न हुआ. इस धार्मिक आयोजन में पंचपरगना क्षेत्र की दर्जनों कीर्तन मंडलियों ने भाग लेकर राधा-कृष्ण के भजनों और हरिनाम संकीर्तन से पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया. तीन दिनों तक गांव और आसपास का क्षेत्र भक्ति रस में सराबोर रहा तथा श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी.

डॉ. राजाराम महतो ने की पूजा-अर्चना
समारोह के प्रथम दिन कुरमाली भाषा-संस्कृति के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रख्यात शिक्षाविद एवं भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की राष्ट्रीय पुस्तकालय सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. राजाराम महतो अपने पैतृक गांव बारूडीह पहुंचे. उन्होंने भगवान श्री राधा-कृष्ण की विधिवत पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद प्राप्त किया तथा कीर्तन मंडलियों के साथ छाल बजाते हुए भक्ति रस में सराबोर हो गए. उनकी सहभागिता से श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह और ऊर्जा का संचार देखने को मिला.
सैकड़ों श्रद्धालुओं ने लिया भाग
इस अवसर पर सैकड़ों महिला-पुरुष श्रद्धालुओं ने भाग लेकर राधा-कृष्ण की महिमा का गुणगान किया. आयोजन ने न केवल धार्मिक आस्था को मजबूती प्रदान की, बल्कि स्थानीय भाषा, संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता को भी सशक्त करने का कार्य किया.
हरि कीर्तन को बताया सामाजिक सद्भाव का प्रतीक
अपने संबोधन में डॉ. राजाराम महतो ने कहा कि बारूडीह गांव प्रकृति की गोद में बसा हुआ उनका पैतृक गांव है और यहां वर्षों से हरि कीर्तन की समृद्ध परंपरा चली आ रही है. उन्होंने कहा कि हरि कीर्तन महाप्रभु चैतन्य की अमूल्य देन है, जिसने समाज को प्रेम, भक्ति और भाईचारे का संदेश दिया. कलियुग में गौर-निताई के नाम से प्रसिद्ध यह परंपरा आज भी लोगों को आध्यात्मिक रूप से जोड़ने का कार्य कर रही है.
सांस्कृतिक चेतना और एकता को मिलती है मजबूती
उन्होंने कहा कि हरि कीर्तन केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक सद्भाव और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है. इससे गांवों में आपसी प्रेम, सहयोग और एकता का वातावरण बनता है. कीर्तन के दौरान लोग नशामुक्त और सात्विक जीवन अपनाते हैं, जिससे समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. उन्होंने प्रत्येक गांव में ऐसे धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों को नियमित रूप से आयोजित करने की आवश्यकता पर बल दिया.
आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों से जोड़ता है हरि कीर्तन
डॉ. महतो ने कहा कि हरि कीर्तन लोगों के दिल और दिमाग को एकाग्र करता है तथा समाज को आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों से जोड़ता है. यही कारण है कि पंचपरगना क्षेत्र में यह परंपरा आज भी जीवंत है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है.
बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु रहे उपस्थित
इस अवसर पर दिलेश्वर महतो, सिदाम महतो, गणेश महतो, सुरेश चंद्र महतो, मृत्युंजय महतो, अशोक महतो, बसंत कुमार महतो, रमेश महतो, गौर चंद्र महतो, सोहन महतो, कालोचंद महतो, कृष्णा महतो, परीक्षित महतो, राकेश महतो, धीरेन महतो, जितेंद्र महतो समेत बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं ग्रामीण उपस्थित रहे.
भक्ति, संस्कृति और सामाजिक समरसता का बना उदाहरण
तीन दिवसीय अखंड हरि कीर्तन का यह आयोजन भक्ति, संस्कृति, सामाजिक समरसता और ग्रामीण एकजुटता का अनुपम उदाहरण बनकर क्षेत्र में चर्चा का विषय रहा.
