विश्व बाघ दिवसः 280 करोड़ स्वाहा, फिर भी झारखंड में भगवान भरोसे टाइगर का वजूद, कागजों पर जिंदा हैं बाघ, जमीन पर दिखता ही नहीं

Ranchi: आज यानि 29 जुलाई को विश्व बाघ दिवस मनाया जा रहा है. विश्व बाघ दिवस के मौके पर वन विभाग के...

Ranchi: आज यानि 29 जुलाई को विश्व बाघ दिवस मनाया जा रहा है. विश्व बाघ दिवस के मौके पर वन विभाग के दफ्तरों में भले ही संरक्षण और संवर्धन के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों, लेकिन झारखंड के इकलौते पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलने के लिए काफी है. स्थापना काल से लेकर अब तक लगभग 280 करोड़ रुपये फूंक देने के बावजूद आज स्थिति यह है कि वन विभाग के पास खुद इस बात का कोई पुख्ता डेटा नहीं है कि रिजर्व में वाकई कोई बाघ जिंदा भी है या नहीं. भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में इस वित्तीय लापरवाही की पोल पहले ही खुल चुकी है.

50 से लेकर जीरो तक का सफर

बेतला स्थित इस ऐतिहासिक रिजर्व को तत्कालीन बिहार सरकार द्वारा 1974 में टाइगर रिजर्व के रूप में नोटिफाई किया गया था. उस स्वर्णिम काल में इस 1,026 वर्ग किलोमीटर (जिसका कोर एरिया 226 वर्ग किलोमीटर है) के विशाल भूभाग पर लगभग 50 बाघ बेखौफ विचरते थे. लेकिन झारखंड अलग राज्य बनने के बाद सरकारी फाइलों और प्रशासनिक उदासीनता ने इन मूक जीवों का ऐसा शिकार किया कि आंकड़े खुद चीखने लगे.
• 2005: सरकारी आंकड़ों के अनुसार कुल 38 बाघ दर्ज किए गए.
• 2006: महज एक साल के भीतर यह आंकड़ा गिरकर सीधे 17 पर आ गया.
• 2009: आधिकारिक गिनती में संख्या घटकर मात्र 8 रह गई.
• 2010 से 2018: 2010 में 6 बाघ, 2014 में सिर्फ 3 और वर्ष 2018 आते-आते पीटीआर का इलाका बाघ विहीन यानी शून्य हो गया.
• वर्तमान आंकड़े: 2023 में 3 और वर्तमान समय में रिजर्व में 6 बाघों की मौजूदगी का दावा किया जा रहा है, जिसकी प्रामाणिकता पर भी गंभीर सवालिया निशान हैं.

क्या है वन विभाग का तर्क

विभाग का तर्क यह है कि रिजर्व क्षेत्र में धड़ल्ले से पुलिस पिकेट बना दिए गए हैं. कायदे और नियम के अनुसार किसी भी टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में पुलिस पिकेट का होना पूरी तरह वर्जित है. इसके बावजूद वर्तमान में बेतला, कुटकू, बरवाडीह, गारू, बारसेन और महुआटांड जैसे संवेदनशील इलाकों में एक दर्जन से अधिक पुलिस पिकेट संचालित हो रहे हैं. नक्सलियों के खिलाफ होने वाली गोलीबारी और भारी हलचल के कारण पैदा होने वाला बारूदी शोर वन्यजीवों के मानसिक संतुलन पर विपरीत असर डालता है, जिसके चलते डरकर जंगली जानवर पड़ोसी जंगलों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं.

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