Ranchi: RIMS के जेनेटिक्स एवं जीनोमिक्स विभाग ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है. अब RIMS में गर्भ में पल रहे शिशु में होने वाली कई गंभीर आनुवांशिक (जेनेटिक) बीमारियों की समय रहते पहचान की जा सकेगी. इससे दंपतियों को सही समय पर इलाज और चिकित्सकीय सलाह मिल सकेगी. रिम्स की विभागाध्यक्ष डॉ. अनूपा प्रसाद ने बताया कि सिकल सेल रोग, थैलेसीमिया, ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी जैसी बीमारियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवारों में चलती हैं. इनकी समय पर जांच कर गर्भस्थ शिशु में बीमारी का पता लगाया जा सकता है.
किए जा चुके हैं 26 प्रसवपूर्व आनुवांशिक परीक्षण
रिम्स में अब तक थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया के 26 प्रसवपूर्व आनुवांशिक परीक्षण किए जा चुके हैं. इन जांचों और आनुवांशिक परामर्श की मदद से दो बीटा-थैलेसीमिया और दो सिकल सेल से प्रभावित शिशुओं के जन्म को रोका गया है. इसके अलावा झारखंड में पहली बार बीटा-कीटोथायोलेज की कमी जैसी दुर्लभ आनुवांशिक बीमारी का भी सफल प्रसवपूर्व निदान किया गया.

9 से 11 सप्ताह और 16 से 20 सप्ताह के बीच की जाती है जांच
रिम्स में यह जांच गर्भावस्था के 9 से 11 सप्ताह और 16 से 20 सप्ताह के बीच की जाती है. जांच के लिए गर्भ से नमूना लेकर DNA परीक्षण किया जाता है. पूरी प्रक्रिया में एक से दो सप्ताह का समय लगता है. रिम्स में इस जांच की लागत केवल 3,500 रुपये है, जबकि निजी लैब में इसके लिए 15 हजार रुपये या उससे अधिक खर्च करना पड़ता है. खास बात यह है कि डीबीटी-निदान केंद्र परियोजना के तहत अगले एक वर्ष तक यह जांच पूरी तरह नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएगी.
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