रांची: झारखंड विधानसभा के बजट सत्र के 16वें दिन सदन ने झारखंड विश्वविद्यालय विधेयक 2026 को पारित कर दिया, जबकि इससे पहले प्रस्तुत झारखंड विश्वविद्यालय विधेयक 2025 को वापस ले लिया गया. मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने बताया कि 2025 के विधेयक में कुछ प्रावधानों में संशोधन और सुधार की आवश्यकता थी, जिसके कारण उसे वापस लेते हुए संशोधित स्वरूप में 2026 का विधेयक सदन में पेश किया गया.

हालांकि इस दौरान विधायक राज सिन्हा और अमित यादव ने विधेयक को प्रवर समिति को भेजने की मांग उठाई और कहा कि यह 135 पृष्ठों का विस्तृत विधेयक है, जिसे पूरी तरह से पढ़ने का समय नहीं मिला. इस पर मंत्री ने स्पष्ट किया कि इसमें केवल मामूली संशोधन किए गए हैं और स्पीकर ने भी बताया कि स्वीकृत निवेदनों को संबंधित विभागों को भेजा जाएगा.
रिजल्ट और प्रशासनिक प्रावधान
विधेयक के प्रमुख प्रावधानों में परीक्षा परिणामों को समयबद्ध तरीके से जारी करने पर जोर दिया गया है. मंत्री सुदिव्य सोनू ने कहा कि विश्वविद्यालयों को 30 दिनों के भीतर परीक्षा परिणाम जारी करने होंगे, जबकि अधिकतम सीमा 45 दिन निर्धारित की गई है.
इसके अलावा सीनेट की बैठक साल में कम से कम दो बार आयोजित की जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त बैठकें भी बुलाई जा सकेंगी. झारखंड विश्वविद्यालय सेवा आयोग में अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों, जैसे प्रधान सचिव या केंद्र सरकार के अधिकारी, को शामिल करने का भी प्रावधान किया गया है, ताकि प्रशासनिक दृष्टिकोण से कार्यप्रणाली को सुदृढ़ बनाया जा सके.
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प्लेसमेंट और छात्रों के लिए व्यवस्था
विधेयक में छात्रों के रोजगार को ध्यान में रखते हुए प्लेसमेंट कंपनियों के लिए अलग से कार्यालय की व्यवस्था करने का प्रावधान रखा गया है. इस पर चर्चा के दौरान राज सिन्हा ने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों में ही प्लेसमेंट कंपनियों के कार्यालय स्थापित किए जाएं, जिससे स्थानीय छात्रों को बेहतर रोजगार अवसर मिल सकें और उनका पलायन रुके.
मंत्री ने जवाब देते हुए कहा कि विधेयक में तय मानकों के अनुरूप ही यह व्यवस्था की गई है और छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए कदम उठाए गए हैं.
विपक्ष के सवाल और सरकार का जवाब
विधेयक पर बहस के दौरान राज सिन्हा ने अपने संशोधन प्रस्ताव में कहा कि उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं होना चाहिए और विधेयक के कुछ प्रावधान मूल सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होते हैं.
उन्होंने राज्यपाल और राज्य सरकार की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए और विश्वविद्यालय की स्वायत्तता कम होने की आशंका जताई. साथ ही कुलपति चयन प्रक्रिया पर पुनर्विचार की मांग की. इस पर मंत्री सुदिव्य सोनू ने स्पष्ट किया कि राज्य के दो संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल और मुख्यमंत्री की समिति राज्यहित में निर्णय लेगी और विधेयक में किसी संशोधन की आवश्यकता नहीं है.

