विनीत आभा उपाध्याय

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने लेन-देन और वित्तीय विवादों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाया है. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है, कि किसी व्यक्ति को ऋण (लोन) के रूप में दी गई राशि को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 के तहत अमानत नहीं माना जा सकता. इसलिए अगर कोई उधार लेने वाला ऋण राशि को वापस करने में विफल रहता है, तो उस पर आपराधिक विश्वासघात का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.

लोन प्राप्त करने के बाद व्यक्ति अपने हिसाब से पैसे का इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र
अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति किसी अन्य को लोन के रूप में पैसे देता है, तो वह राशि पैसा लेने वाले को अमानत के रूप में नहीं सौंपी जाती. लोन प्राप्त करने के बाद व्यक्ति उस पैसे का उपयोग अपनी इच्छा अनुसार करने के लिए स्वतंत्र होता है. अमानत में खयानत का अपराध तब बनता है, जब किसी व्यक्ति को कोई संपत्ति किसी विशेष उद्देश्य या शर्तों के अधीन सौंपी जाती है और वह व्यक्ति उसका दुरुपयोग करता है. इसके विपरीत ऋण लेन-देन में पैसे का स्वामित्व और नियंत्रण उधारकर्ता को हस्तांतरित हो जाता है. पैसा लेने वाले पर सिर्फ ली गई राशि को समझौते के अनुसार चुकाने का सिविल दायित्व होता है.

लोन की रकम न लौटा पाने जैसे मामलों को जबरन आपराधिक रंग देना सही नहीं
साथ ही हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि केवल लोन की रकम न लौटा पाने या चेक बाउंस होने जैसे मामलों को जबरन आपराधिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए. ऐसे विवाद पूरी तरह से सिविल प्रकृति यानी दीवानी विवाद के होते हैं. शिकायतकर्ता के पास बकाया राशि की वसूली के लिए सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाने या एनआई एक्ट के तहत कानूनी कदम उठाने का विकल्प मौजूद रहता है.
हाईकोर्ट का यह फैसला व्यावसायिक लेन-देन और व्यक्तिगत ऋण के मामलों में काफी अहम माना जा रहा है. क्योंकि, अक्सर देखा जाता है कि लोन या पैसे के लेन-देन में विवाद होने पर पक्षकार तुरंत FIR दर्ज कराकर आपराधिक मामला दर्ज कराने का प्रयास करते हैं. लेकिन इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है, कि केवल लोन न चुका पाने के आधार पर आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती, जब तक कि शुरुआत से ही धोखाधड़ी की नीयत साबित न हो.
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