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60 सालों में कैसे बदला नक्सलवाद का सफर? जानिए उभार, विस्तार और पतन की पूरी कहानी

SAURAV SINGH Ranchi: नक्सलबाड़ी के सशस्त्र विद्रोह से शुरू हुआ माओवादी आंदोलन आज अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है. जमींदारी...

SAURAV SINGH

Ranchi: नक्सलबाड़ी के सशस्त्र विद्रोह से शुरू हुआ माओवादी आंदोलन आज अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है. जमींदारी शोषण और सामाजिक असमानता के खिलाफ उभरा यह संघर्ष अब अंतिम सांसें ले रहा है. पढ़िए 1967 से लेकर 2026 तक नक्सलवाद के उभार, प्रसार, वैचारिक मतभेदों और पतन की पूरी कहानी.

हिंसा के आंकड़े: साल 2000 से 2026 तक

  • आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2000 से 2026 के बीच माओवादी हिंसा में पूरे देशभर में कुल 14599 लोगों की जान गई, जिनमें झारखंड में 842 लोगों की मौत हुई.
  • इस अवधि के दौरान पूरे देशभर में 7622 सुरक्षाबल नक्सल लड़ाई में शहीद हुए जिनमें झारखंड 556 में जवान शहीद हुए.
  • पूरे देशभर में 24895 नक्सली मारे गए और झारखंड में 858 नक्सली मारे गए.

पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव से हुई थी नक्सली आंदोलन की शुरुआत

नक्सलबाड़ी की चिंगारी और ‘स्प्रिंग थंडर’

भारतीय राजनीति और समाज को गहरे तक प्रभावित करने वाले नक्सली आंदोलन की शुरुआत 25 मई 1967 को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गांव से हुई थी. सिलीगुड़ी में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) के कट्टरपंथी धड़े ने कर्ज में डूबे आदिवासियों और भूमिहीन किसानों को एकजुट कर स्थानीय जमींदारों के खिलाफ मोर्चा खोला. इस दौरान हुई एक हिंसक झड़प में पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर की तीर-कमान से मारकर हत्या कर दी गई. इसके जवाब में पुलिस द्वारा की गई गोलीबारी में आठ महिलाओं, दो बच्चों और एक पुरुष समेत 11 लोगों की मौत हो गई. इस घटना ने एक देशव्यापी सशस्त्र संघर्ष का रूप ले लिया, जिसे चीनी मीडिया ने ‘स्प्रिंग थंडर ओवर इंडिया’ (भारत पर वसंत की गर्जना) करार दिया. इस आंदोलन का वैचारिक आधार स्थानीय CPI(M) नेता चारु मजूमदार द्वारा तैयार किए गए ‘आठ दस्तावेज’ थे, जिसमें उन्होंने गुरिल्ला युद्ध के जरिए ‘इंडियन स्टेट’ (भारतीय राज्य) को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था. कानू सान्याल और जंगल संथाल के साथ मिलकर चारु मजूमदार ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया, जो देखते ही देखते श्रीकाकुलम (आंध्र प्रदेश), तेलंगाना, बिहार और दंडकारण्य के घने जंगलों तक फैल गया.

चारू मजूमदार

चीनी क्रांति की तर्ज पर सशस्त्र विद्रोह के जरिए सत्ता पर कब्जा करना था लक्ष्य

यह आंदोलन स्थानीय मुद्दों और आदिवासियों की शिकायतों पर केंद्रित था, लेकिन इसका राजनीतिक लक्ष्य चीनी क्रांति की तर्ज पर सशस्त्र विद्रोह के जरिए सत्ता पर कब्जा करना था.

1960 के दशक के अंत में सोवियत संघ का प्रभाव कम होने लगा था और 1949 की चीनी क्रांति ने भारतीय चरमपंथियों को सबसे ज्यादा प्रेरित किया. चारु मजूमदार ने यहां तक नारा दिया था “चीन का चेयरमैन हमारा चेयरमैन है”.

इस आंदोलन ने उस दौर में मध्यम वर्ग और देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों के युवाओं को तेजी से आकर्षित किया. कोलकाता का प्रेसिडेंसी कॉलेज और दिल्ली का सेंट स्टीफंस कॉलेज इसके मुख्य केंद्र बने, जहां से छात्र पढ़ाई छोड़कर गांवों में किसानों को संगठित करने पहुंच गए.

1964 में CPI से अलग होकर CPI(M) बनी

1964 में CPI से अलग होकर CPI(M) बनी थी, लेकिन सशस्त्र संघर्ष के पक्षधर असंतुष्ट नेताओं ने ‘ऑल इंडिया कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ कम्युनिस्ट रिवॉल्यूशनरीज’ बनाई, जिसने 1969 में CPI(M-L) का रूप लिया, हालांकि, कठोर पुलिस कार्रवाई, भूमि सुधारों और आंतरिक संगठनात्मक कमजोरियों के कारण 1972 तक यह आंदोलन पहला बड़ा झटका खाकर बिखर गया. बाद में संस्थापक नेता कानू सान्याल ने स्वीकार किया था, कि इस शुरुआती विद्रोह में “संगठनात्मक ढांचे, जनाधार और सैन्य रणनीति की भारी कमी थी.”

वारंगल रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज  माओवादी भर्ती का प्रमुख केंद्र बन गया

1970 के दशक के उत्तरार्ध में इस आंदोलन ने नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार की. 22 अप्रैल 1980 (लेनिन जयंती) को आंध्र प्रदेश में कोंडापल्ली सीतारमैया ने CPI(M-L) पीपुल्स वॉर का गठन किया. वहीं, कनाई चटर्जी के नेतृत्व में बिहार-बंगाल क्षेत्र में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर मजबूत हुआ. दोनों गुटों ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को खारिज करते हुए तत्काल सशस्त्र संघर्ष और भूमिगत संगठन बनाने पर जोर दिया. माओवादियों ने बस्तर और दंडकारण्य के सुदूर इलाकों में आदिवासियों के बीच आधार तैयार किया. उन्होंने बंधुआ मजदूरी के खात्मे, वन उपज के उचित दाम और शोषणकारी टैक्सों के खिलाफ लड़ाई लड़ी. माओवादियों ने इस क्षेत्र में धान की आधुनिक खेती सिखाई, सहकारिता समितियां बनाईं और स्कूल व तालाब बनवाए. तेलंगाना का वारंगल रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज (अब NIT) माओवादी भर्ती का प्रमुख केंद्र बन गया, जहां से नंबाला केशव राव (वर्तमान सीपीआई-माओवादी महासचिव) जैसे शीर्ष कैडर निकले.

आंदोलन के पतन के मुख्य कारण

1990 के दशक के बाद से भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति में आए बदलावों ने माओवादी आंदोलन की जड़ों को हिलाकर रख दिया. सोवियत संघ के विघटन के बाद मार्क्सवाद का आकर्षण घटा. वैश्वीकरण, आईटी बूम, हरित क्रांति की सफलता और गरीबी दर में आई ऐतिहासिक गिरावट (1977 में 59.07% से घटकर 2022 में 5.25%) ने ग्रामीण युवाओं को नई आकांक्षाएं दीं. 1990 के दशक में दलित, नारीवादी और साहित्यिक आंदोलनों का तेजी से उभार हुआ. 1990 में डॉ. बी.आर. आंबेडकर को ‘भारत रत्न’ मिलने और मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद दलित और पिछड़े वर्ग की राजनीति मुख्यधारा से जुड़ गई, जिससे माओवादियों का पारंपरिक कैडर आधार खिसक गया.

लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिंसा की स्वीकार्यता समाप्त होने लगी. पूर्व नक्सल समर्थकों का मानना था कि चार दशकों के संघर्ष के बावजूद माओवादी सरकार की किसी बड़ी नीति को बदलने या रोकने में पूरी तरह विफल रहे.

2004 का विलय, कड़ा सुरक्षा प्रहार और वर्तमान स्थिति

साल 2004 में पीपुल्स वॉर ग्रुप और एमसीसी का विलय कर CPI (माओवादी) का गठन किया गया. इसी वर्ष आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित शांति वार्ता विफल रहने के बाद राज्य ने माओवादियों के खिलाफ चौतरफा अभियान शुरू किया. आंध्र प्रदेश के ग्रेहाउंड्स और छत्तीसगढ़ में स्थानीय आदिवासियों से बने डिस्ट्रिक रिजर्व गार्ड और झारखंड का झारखंड जगुआर ने जंगलों में माओवादियों के सुरक्षित ठिकानों को ध्वस्त कर दिया. ड्रोन तकनीक, सैटेलाइट सर्विलांस और आधुनिक हथियारों ने सुरक्षा बलों को निर्णायक रणनीतिक बढ़त दिलाई. सुदूर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण, मोबाइल टावर और कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच ने माओवादियों के प्रभाव क्षेत्र को सीमित in कर दिया. शहरी क्षेत्रों में माओवादियों के लॉजिस्टिक व वैचारिक नेटवर्क को कानून-व्यवस्था के तहत चिन्हित कर ध्वस्त किया गया.

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