मदर्स डे पर छलका एक मां का दर्द: “जिसे 9 महीने कोख में रखा, आज वही कहता है- मां से कोई मतलब नहीं”

Giridih: एक तरफ पूरे देश में मदर्स डे पर मां की ममता को सलाम किया जा रहा है. सोशल मीडिया पर लोग...

Shanti Devi
शांति देवी

Giridih: एक तरफ पूरे देश में मदर्स डे पर मां की ममता को सलाम किया जा रहा है. सोशल मीडिया पर लोग अपनी मां के साथ तस्वीरें साझा कर रहे हैं, उनके त्याग और प्रेम की कहानियां लिख रहे हैं. वहीं, दूसरी तरफ गिरिडीह के एक वृद्धाश्रम में बैठी 70 वर्षीय शांति देवी की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे. जिस मां ने अपने बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया, जिनके भविष्य के लिए पति के साथ मिलकर पूरी जिंदगी संघर्ष किया, आज वही मां अपने ही बेटों के होते हुए वृद्धाश्रम में अकेली जिंदगी बिताने को मजबूर है. मदर्स डे के दिन उनकी दर्दभरी कहानी सुनकर आश्रम में मौजूद लोगों की आंखें भी नम हो गईं.

“मां अब किसी काम की नहीं…” कहकर छोड़ गया बेटा

मूल रूप से बिहार के मोकामा की रहने वाली शांति देवी पिछले दो-तीन महीनों से गिरिडीह के बस स्टैंड रोड स्थित एक वृद्धाश्रम में रह रही हैं. कांपती आवाज और नम आंखों के साथ उन्होंने अपनी आपबीती सुनाई. उन्होंने बताया कि उनके पति स्व. मधुसूदन प्रसाद मोकामा में व्यवसाय करते थे. मेहनत और संघर्ष के दम पर उन्होंने अपने दोनों बेटों को पढ़ाया-लिखाया और जिंदगी में स्थापित किया. बड़ा बेटा कृष्ण कुमार बर्नवाल मुंबई में दवा व्यवसाय से जुड़ा है, जबकि छोटा बेटा गोपाल प्रसाद बर्नवाल उर्फ बबलू गिरिडीह के मकतपुर में रहता है.

शांति देवी बताती हैं कि पति की मौत के बाद उन्होंने बड़ी उम्मीदों के साथ बेटों का सहारा लिया था. उन्हें विश्वास था कि जिस परिवार के लिए उन्होंने पूरी जिंदगी खपा दी, वही परिवार बुढ़ापे में उनका सहारा बनेगा. लेकिन हालात धीरे-धीरे बदलते चले गए. उनके अनुसार, छोटे बेटे की पत्नी अक्सर उन्हें ताने देती थी. घर में उनकी उपस्थिति बहू को पसंद नहीं थी. इसी बीच बेटे ने मां के पास जमा करीब दो लाख रुपये भी ले लिए. शांति देवी का आरोप है कि पैसे लेने के बाद बेटे का व्यवहार पूरी तरह बदल गया.

वह कहती हैं, “पैसा लेने के बाद बेटे ने कहा- अब तू मेरे किसी काम की नहीं. फिर मुझे बैग के साथ ऑटो में बैठाकर वृद्धाश्रम छोड़ गया.”
कागज पर लिख दिया- “मां से कोई मतलब नहीं.”

शांति देवी बताती हैं कि वृद्धाश्रम लाने के बाद बेटे ने उनसे कुछ कागजों पर हस्ताक्षर करवाए. उस समय उन्हें यह नहीं बताया गया कि उन कागजों में क्या लिखा है. बाद में पता चला कि उसमें लिखा था- “मुझे मेरी मां से कोई मतलब नहीं.” यह बात बताते हुए शांति देवी फफक पड़ती हैं. वे बार-बार एक ही सवाल पूछती हैं, “क्या कोई बेटा अपनी मां के लिए ऐसा लिख सकता है?”  वे कहती हैं, “जिसे 9 महीने पेट में रखा, गोद में खिलाया-पिलाया, उसके लिए दिन-रात मेहनत की, वही आज कहता है कि मां से कोई मतलब नहीं. पति की मौत के बाद जो थोड़ा बहुत पैसा बचाकर रखा था, वो भी ले लिया. अब दो वक्त की रोटी के लिए दूसरों पर निर्भर हूं.”

पति के संघर्ष को याद कर रो पड़ती हैं शांति देवी

वृद्धाश्रम के एक कमरे में बैठी शांति देवी जब अपने पति को याद करती हैं तो खुद को संभाल नहीं पातीं. उनका कहना है कि उनके पति ने खून-पसीने की कमाई से परिवार खड़ा किया था. वे कहती हैं, “मेरे पति ने दिन-रात मेहनत करके बेटों को इस मुकाम तक पहुंचाया. कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन उन्हीं बच्चों के रहते मुझे आश्रम में रहना पड़ेगा.” उनके अनुसार, पति की मौत के बाद से ही परिवार में दूरियां बढ़ने लगी थीं. धीरे-धीरे बेटों और बहुओं का व्यवहार बदलता गया और अंत में उन्हें घर से अलग कर दिया गया.

बेटी भी नहीं ले रही हालचाल

शांति देवी की पीड़ा सिर्फ बेटों तक सीमित नहीं है. उन्होंने बताया कि गिरिडीह के बभनटोली में रहने वाली उनकी बेटी संध्या देवी भी अब उनका हाल पूछने नहीं आती. वृद्धाश्रम में रहने के दौरान उन्होंने कई बार अपने बच्चों से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें अपनापन नहीं मिला. अब वे दिनभर आश्रम के एक कोने में बैठी अपने पुराने दिनों को याद करती रहती हैं.

“अगर पति जिंदा होते तो ये दिन नहीं देखना पड़ता”

मदर्स डे पर जब लोग अपनी मां को गले लगा रहे थे, उपहार दे रहे थे और उनके साथ समय बिता रहे थे, तब शांति देवी अकेली बैठी रो रही थीं. वे कहती हैं, “अगर मेरे पति जिंदा होते तो शायद मुझे ये दिन नहीं देखना पड़ता. अब तो लगता है ऐसे जीने से अच्छा मर जाना है.” हालांकि आश्रम के लोग उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन अपने ही बच्चों से मिले इस दर्द ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया है.

समाज के लिए एक बड़ा सवाल

शांति देवी की कहानी सिर्फ एक मां की पीड़ा नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक मूल्यों पर भी बड़ा सवाल खड़ा करती है. जिस मां-बाप ने अपने बच्चों की खुशी के लिए पूरी जिंदगी लगा दी, आज वही बुजुर्ग अपने ही घरों में बोझ समझे जा रहे हैं. मदर्स डे जैसे अवसर पर यह घटना हर किसी को सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आधुनिक जीवन की भागदौड़ और स्वार्थ के बीच हम रिश्तों की असली कीमत भूलते जा रहे हैं?

मां सिर्फ एक रिश्ता नहीं, बल्कि त्याग, ममता और निस्वार्थ प्रेम की सबसे बड़ी पहचान होती है. लेकिन जब वही मां वृद्धाश्रम के एक कमरे में बैठकर अपने बच्चों के लौटने का इंतजार करे, तो यह सिर्फ एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की संवेदनहीनता की कहानी बन जाती है.

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