Ranchi: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने असम के चुनावी रण में आदिवासियों के हक और पहचान का मुद्दा उठाकर एक बड़ी सियासी हलचल पैदा कर दी है. असम विधानसभा चुनाव की बिसात पर सीएम हेमंत सोरेन ने आदिवासी अस्मिता का एक ऐसा दांव चला है, जिसने सत्ता के गलियारों में हलचल तेज कर दी है.
असम चाय बागानों से उठी आवाज
असम के चाय बागानों में पीढ़ियों से खून-पसीना बहा रहे आदिवासी समाज की बदहाली पर कड़ा प्रहार करते हुए हेमंत सोरेन ने इसे राष्ट्रीय स्तर का अन्याय करार दिया है. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिन लोगों ने अंग्रेजों के दौर से लेकर आज तक असम की अर्थव्यवस्था को अपने कंधों पर टिकाए रखा, उन्हें आज तक अनुसूचित जनजाति का संवैधानिक दर्जा न मिलना लोकतंत्र की विफलता है.
राजनीति से ऊपर न्याय की लड़ाई
मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे को राजनीति से ऊपर बताते हुए इसे न्याय, सम्मान और अस्तित्व की लड़ाई घोषित कर दिया है. उन्होंने कहा कि यह केवल एक चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने की मांग है.
पहचान की लड़ाई
सीएम ने कहा कि अंग्रेजों द्वारा विस्थापित किए गए आदिवासियों को उनकी नई मिट्टी असम में आज तक पहचान की मान्यता नहीं मिली. दशकों से सरकारें बदलीं, लेकिन किसी भी दल ने इस समाज को अपने घोषणापत्र में प्राथमिकता नहीं दी.
संवैधानिक अधिकार की पुकार
हेमंत सोरेन ने पुरजोर तरीके से मांग की है कि अब और इंतजार नहीं, इस समाज को उनका पूरा संवैधानिक अधिकार और सम्मान मिलना ही चाहिए.
