Ranchi: असम की राजनीति में इस बार दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है, जहां हेमंत सोरेन ने सीधे हिमंता बिस्वा सरमा को उनके ही होम ग्राउंड पर चुनौती दी है. झामुमो ने असम चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है, जिसे हाई-रिस्क और हाई-रिवॉर्ड वाली रणनीति माना जा रहा है.
आदिवासी अस्मिता और झारखंड मॉडल पर फोकस
हेमंत सोरेन की रणनीति झारखंड मॉडल और आदिवासी अस्मिता के मुद्दे पर आधारित है. अगर यह दांव असम में चल गया, तो वे राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े आदिवासी नेता के रूप में उभर सकते हैं. वहीं हिमंता बिस्वा सरमा के सामने अपनी हिंदुत्व छवि और विकास के एजेंडे के बीच इस चुनौती को संतुलित करने की चुनौती है.
चाय बागान से सत्ता तक की रणनीति
असम में हेमंत सोरेन खास तौर पर टी ट्राइब्स और झारखंड से जाकर बसे आदिवासी समुदाय—संथाल, मुंडा, उरांव और हो—को साधने में जुटे हैं. राज्य में करीब 60 से 70 लाख की आबादी इन समुदायों की है. झारखंड में जहां इन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला है, वहीं असम में ये ओबीसी वर्ग में आते हैं, जिसे सोरेन ने बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है.
कांग्रेस से दूरी, अकेले चुनावी मैदान में उतरने का फैसला
झारखंड में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद, हेमंत सोरेन ने असम में 21 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. यह संकेत देता है कि वे अपनी पार्टी को एक स्वतंत्र क्षेत्रीय ताकत के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, न कि कांग्रेस के जूनियर पार्टनर के रूप में.
क्या है हेमंत सोरेन की ताकत
वोट बैंक: 30-35 सीटों पर निर्णायक टी ट्राइब्स और आदिवासी वोट
मुद्दे: सामाजिक न्याय, जल-जंगल-जमीन और एसटी दर्जा
संगठन: झारखंड से आए अनुभवी कार्यकर्ताओं और 20 स्टार प्रचारकों की टीम
राजनीतिक समीकरण बदलने की कोशिश
अगर झामुमो चाय बागानों की 5 से 10 सीटें भी जीतने में सफल रहती है, तो वह असम की राजनीति में एक मजबूत प्रेशर ग्रुप बन सकती है. यह मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि भविष्य की क्षेत्रीय राजनीति के विस्तार का भी संकेत दे रहा है.
