झारखंड में ‘ब्लड पॉलिटिक्स’- हाई कोर्ट का आदेश कागजों पर, जमीन पर ‘खून के बदले खून’ का खेल?

रांची: झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर विवादों के घेरे में है. इस बार मामला सीधा आम आदमी की जान और...

High Court

रांची: झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर विवादों के घेरे में है. इस बार मामला सीधा आम आदमी की जान और उसकी रगों में दौड़ने वाले खून से जुड़ा है. राज्य के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी का ताजा बयान कि “बिना डोनेशन (रिप्लेसमेंट) के मरीजों को ब्लड देना मुमकिन नहीं है”, यह न सिर्फ चौंकाने वाला है बल्कि झारखंड हाई कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले को भी चुनौती दे रहा है, जिसे मरीजों को राहत देने के लिए लाया गया था.

मंत्री जी का कहना है कि वे हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ संशोधन के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार व्यवस्था सुधारने के बजाय नियमों को ही बदलने पर आमादा है?

1. मंत्री का तर्क: “बिना डोनेशन बैंक हो जाएंगे खाली”

स्वास्थ्य मंत्री ने स्पष्ट कहा है कि अगर बिना रिप्लेसमेंट के ब्लड बैंक से खून दिया गया, तो स्टॉक खत्म हो जाएगा और व्यवस्था चरमरा जाएगी. लेकिन हकीकत के धरातल पर यह तर्क गरीबों के लिए ‘फांसी के फंदे’ जैसा है.

इमरजेंसी में कहां जाएं परिजन? एक्सीडेंट या अचानक सर्जरी की स्थिति में गरीब परिजन तुरंत ‘डोनर’ कहां से लाएं?

अकेले मरीज का क्या होगा? कई मरीज ऐसे होते हैं जिनका कोई सहारा नहीं होता, क्या बिना डोनर के उन्हें मरने के लिए छोड़ दिया जाएगा?

2. हाई कोर्ट के आदेश की ‘धज्जियां’ उड़ाती व्यवस्था

दिसंबर 2025 में झारखंड हाई कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था, कि किसी भी मरीज को ब्लड के लिए तड़पाया नहीं जा सकता और “खून के बदले खून” की शर्त पूरी तरह गलत है. कोर्ट ने सरकार को 100% स्वैच्छिक रक्तदान (Voluntary Donation) सुनिश्चित करने को कहा था.  मगर रांची के अस्पतालों का हाल देखिए:

अस्पतालों की मनमानी: रिम्स (RIMS) हो या निजी अस्पताल, बिना डोनर के फाइल आगे नहीं बढ़ती.

परिजनों की पीड़ा: एक तरफ मरीज ऑपरेशन टेबल पर जिंदगी की जंग लड़ रहा होता है, दूसरी तरफ परिजन हाथ में पर्ची लेकर डोनर के लिए सड़कों पर भटक रहे होते हैं.

ब्लड माफिया का बोलबाला: जब मजबूर परिजन डोनर नहीं पाते, तो अस्पतालों के बाहर सक्रिय ‘दलाल’ हजारों रुपये में खून का सौदा करते हैं.

3. सरकारी तंत्र की विफलता या मजबूरी?

मंत्री जी का यह कहना कि आदेश मानना “मुमकिन नहीं”, सीधे तौर पर विभाग की विफलता स्वीकार करने जैसा है. पिछले महीनों में राज्य के ब्लड बैंकों में खून की भारी कमी देखी गई है. सरकार ‘स्वैच्छिक रक्तदान’ को बढ़ावा देने के लिए बड़े कैंप लगाने और लोगों को जागरूक करने में नाकाम रही है, जिसका खामियाजा अब मरीजों को भुगतना पड़ रहा है.

जवाब कौन देगा?

क्या सिस्टम डोनर पैदा करेगा या सिर्फ मरीजों को तड़पाएगा? अगर सरकार स्वैच्छिक रक्तदान के लिए ठोस नीति नहीं बना सकती, तो क्या मरीजों की जान जोखिम में डालना जायज है?

हाई कोर्ट के आदेश का क्या? जब स्वास्थ्य मंत्री ही आदेश को ‘नामुमकिन’ बता रहे हैं, तो आम जनता किस पर भरोसा करे?

ब्लड बैंकों की बदहाली क्यों? चाईबासा और कोडरमा जैसे जिलों में संक्रमित खून चढ़ाने जैसे मामले सामने आने के बाद भी व्यवस्था में सुधार क्यों नहीं हुआ?

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