SAURAV SINGH
Ranchi: प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) का शीर्ष कैडर, पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति सदस्य मिसिर बेसरा उर्फ सागर दा को सुरक्षाबलों ने लंबे समय के बाद धनबाद से मंगलवार की रात गिरफ्तार कर लिया है. वह पिछले तीन दशक से सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ था. एक करोड़ रुपये के इनामी और 141 आपराधिक मामलों के आरोपी मिसिर बेसरा की तलाश में सुरक्षा बल कोल्हान और सारंडा के दुर्गम जंगलों में लगातार सघन अभियान चला रहे थे.
हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के उस ऐलान के बाद जिसमें उन्होंने मार्च 2026 के बाद देश को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त करने का संकल्प दोहराया था. सुरक्षा बलों ने मिसिर बेसरा और असीम मंडल जैसे अंतिम बड़े माओवादी शीर्ष नेताओं को घेरने के लिए अभियान तेज कर दिए थे. मिसिर बेसरा तो पकड़ा गया लेकिन असीम मंडल अभी भी सुरक्षाबलों के पकड़ से दूर है. इस गिरफ्तारी में सीआरपीएफ आईजी साकेत सिंह, आईजी अभियान नरेंद्र सिंह और झारखंड जगुआर के आईजी अनूप बिरथरे की भूमिका अहम रही है.

जानें कौन है मिसिर बेसरा और उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि
- पूरा नाम: मिसिर बेसरा
- उपनाम: सागर दा, भास्कर दा, सुनिर्मल दा, प्रधान दा
- जन्म वर्ष: 1960 (उम्र लगभग 65 वर्ष)
- पिता का नाम: स्वर्गीय दर्पण बेसरा
- माता का नाम: रसोमति देवी
- मूल पता: गांव- मदनाडीह, थाना- पीरटांड़, जिला- गिरिडीह (झारखंड)
- शारीरिक बनावट: सांवला रंग, कद 5 फीट 5 इंच, गोल चेहरा, चपटी नाक, काली आंखें, पतली व गठीली काया (मूंछ और काले बाल रखता है).
- शिक्षा: राजनीति विज्ञान में स्नातक व स्नातकोत्तर.
- भाषा ज्ञान: हिंदी, संथाली और हो भाषा में निपुण.
- आदत: खैनी खाने का आदी.
- पारिवारिक पृष्ठभूमि: बेटा दिहाड़ी मजदूर, घर छोड़ रचाई दूसरी दुनिया मिसिर बेसरा की पारिवारिक स्थिति और उसके उग्रवाद के रास्ते पर जाने के बाद का पारिवारिक बिखराव उसकी व्यक्तिगत कहानी का एक बड़ा पहलू है.
- पहली पत्नी व पुत्र: शुरुआती युवावस्था में बेसरा का विवाह मोनासी देवी से हुआ था. उनका एक 37 वर्षीय पुत्र सिद्धार्थ है, जो आज दिहाड़ी मजदूरी कर अपना जीवन यापन कर रहा है. मिसिर के घर छोड़ने के कुछ वर्षों बाद पत्नी ने दूसरी शादी कर ली.
- दूसरी पत्नी: श्यामा दी
- भाई: देवी लाल बेसरा (पारा टीचर)
- संपत्ति: पैतृक गांव में केवल तीन एकड़ कृषि योग्य भूमि और एक खपरैल का मकान है.

छात्र राजनीति से उग्रवाद और ‘लखीसराय कोर्ट जेलब्रेक’ का खौफनाक इतिहास, एक साथ 55 जवानों की हत्या के बाद बढ़ा कद
– मिसिर बेसरा का वामपंथी उग्रवाद से जुड़ाव छात्र जीवन के दौरान धनबाद के राजगंज में पढ़ाई के दौरान हुआ. यह दौर झारखंड आंदोलन और सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल का था.
– 1980 के दशक में मिसिर बेसरा ने घर छोड़ दिया और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) में शामिल हो गया.
– साल 1985-1986 में सिंदरी में आयोजित सम्मेलन में वॉलिंटियर के रूप में काम किया. साल 1986 में सोवन मरांडी ने उसे संगठन की प्राथमिक सदस्यता दिलाई.
– साल 1990-2000: एमसीसी नेता प्रशांत बोस उर्फ किशन दा के संपर्क में आकर उसने कोलकाता, रांची और दक्षिणी छोटानागपुर क्षेत्र में संगठन का तेजी से विस्तार किया. 2000 में ‘झारखंड रीजनल कमेटी’ का गठन किया और बुंडू क्षेत्र में पहला सशस्त्र दस्ता बनाया.
– साल 2003-2004 के खूनी हमले: 2003 और 2004 में पश्चिम सिंहभूम के बिटकिलसोय और बलिबा में हुए बड़े आईईडी हमलों में 55 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे. इन हमलों के बाद बेसरा का कद बढ़ा और उसे केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) तथा ईस्टर्न रीजनल ब्यूरो (ईआरबी) का प्रमुख बनाया गया.
– 2009 का चर्चित जेलब्रेक: जून 2009 में बिहार के लखीसराय कोर्ट में पेशी के दौरान लगभग 30 सशस्त्र माओवादियों ने मोटरसाइकिल से हमला कर दिया. बमबारी और फायरिंग के बीच एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई और माओवादी मिसिर बेसरा को छुड़ा ले गए. तब से वह लगातार फरार थे.

लेवी वसूली था कमाई का जरिया, कोल्हान और सारंडा बना ठिकाना
भाकपा (माओवादी) का पोलित ब्यूरो सदस्य, केंद्रीय कमेटी सदस्य, केंद्रीय मिलिट्री सदस्य और ईस्टर्न रीजनल ब्यूरो प्रमुख मिसिर बेसरा कोल्हान और सारंडा के दुर्गम जंगल (जराईकेला, छोटानगरा, मनोहरपुर के सीमावर्ती क्षेत्र) तुम्बाहाका, पाटातोरोप, रेंगड़ाहातु, आंजेदबेड़ा जैसे गांव इसके भ्रमणशील शरण स्थल रहे हैं. निर्माण ठेकेदारों और विकास योजनाओं से वसूली जाने वाली लेवी व रंगदारी कमाई का जरिया था.

वर्चस्व की जंग असीम मंडल बनाम मिसिर बेसरा
जनवरी 2026 में शीर्ष माओवादी नेता अनल दा के मारे जाने के बाद संगठन में मिसिर बेसरा और पश्चिम बंगाल के एक करोड़ के इनामी माओवादी असीम मंडल उर्फ आकाश के बीच सत्ता संघर्ष छिड़ गया था. कुछ नक्सली मिश्रित बेसर का समर्थन कर रहे थे तो कुछ नक्सली असीम मंडल का इसका नतीजा यह हुआ कि संगठन बेहद कमजोर हो गया.
