Ranchi : झारखंड राज्य बिजली वितरण निगम को लगभग 3,618 करोड़ रुपये का शुद्ध घाटा हुआ है. महज एक साल के भीतर कंपनी का घाटा करीब 78 प्रतिशत बढ़ गया. एक तरफ बिजली की दरें बढ़ाने के लिए लगातार दबाव बनाया जाता है. वहीं दूसरी तरफ प्रबंधन की नाकामियों के कारण नुकसान का यह ग्राफ आसमान छू रहा है. इसका खुलासा ऑडिट रिर्पोट में हुआ है. रिर्पोट के अनुसार संचित घाटा इतना विशाल हो चुका है कि कंपनी की अपनी पूंजी (Equity) पूरी तरह साफ हो चुकी है और लायबिलिटीज का बोझ बढ़ता ही जा रहा है.
बिजली खरीद में भारी गड़बड़ी : कैग ने पकड़ी बड़ी चोरी
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षककी टिप्पणियों के अनुसार, जेबीवीएनएल ने बिजली खरीद और ट्रांसमिशन शुल्क के रूप में 7,69,102.96 लाख रुपये खर्च दिखाए, लेकिन इसमें 530.42 करोड़ रुपये की उस भारी – भरकम राशि को छुपा लिया गया, जो ‘लेट पेमेंट सरचार्ज’ (विलंब शुल्क) के रूप में थी. झारखंड ऊर्जा संचरण निगम लिमिटेड और तेनुघाट विद्युत निगम लिमिटेड द्वारा क्लेम किए गए इस सरचार्ज को बही-खाते में दर्ज ही नहीं किया गया. ऐसा करके कंपनी ने अपने वास्तविक खर्चों और नुकसान को कागजों पर कम दिखाने की नाकाम कोशिश की, जो कि कॉरपोरेट गवर्नेंस और वित्तीय पारदर्शिता के नियमों का खुला उल्लंघन है.
बही-खातों में अरबों का अंतर
बिजली विभाग की लापरवाही का आलम यह है कि सरकारी कंपनियों के बीच आपस में ही पैसों का हिसाब – किताब नहीं मिल रहा है. ‘ट्रेड पेबल्स’ (उधारी) के आंकड़ों को देखें तो जेबीवीएनएल ने अपनी किताबों में ऊर्जा संचरण और टीवीएनएल का कुल बकाया 4,577.18 करोड़ रुपये दर्ज किया है. इसके विपरीत, जब इन दोनों सप्लायर कंपनियों के खाते देखे गए, तो वे जेबीवीएनएल पर कुल 7,267.57 करोड़ रुपये का दावा कर रहे हैं. यानी 2,690.39 करोड़ रुपये का एक ऐसा ‘अदृश्य’ अंतर है. जिसका जवाब किसी के पास नहीं है. एक ही राज्य सरकार के अधीन आने वाले तीन अलग-अलग महकमे आपस में अरबों रुपये के इस अंतर को सालों से ( रिकॉन्सिलिएशन ) मिलान नहीं कर पाए हैं.
8,700 करोड़ की उधारी, वसूली की उम्मीद बेहद कम
जेबीवीएनएल केवल बिजली खरीदने और उसका हिसाब रखने में ही नाकाम नहीं है, बल्कि उपभोक्ताओं से बिल वसूलने में भी इसके हाथ-पैर फूले हुए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी का कुल ‘ट्रेड रिसीवेबल्स’ (ग्राहकों पर बकाया) 8,702.57 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था. इस बकाए में से 3,308.61 करोड़ रुपये की राशि को ‘संदेहास्पद कर्ज मान लिया गया है. यानी विभाग को खुद भरोसा नहीं है कि यह पैसा कभी लौटकर आएगा भी या नहीं. इस संदेहास्पद उधारी के एवज में जो प्रोविजनिंग (प्रावधान) की गई है, वह महज 38.02 प्रतिशत है. सीधे शब्दों में कहें तो करोड़ों यूनिट बिजली बांट दी गई, लेकिन उसकी कीमत वसूलने में प्रबंधन पूरी तरह फेल रहा. जिसका खामियाजा अंततः टैक्स भरने वाली ईमानदार जनता को भुगतना पड़ रहा है.
उदय योजना का दुरुपयोग : ग्रांट और लोन के नाम पर वित्तीय बाजीगरी
रिपोर्ट का एक और सनसनीखेज पहलू सरकार से मिलने वाली वित्तीय मदद की गलत अकाउंटिंग है. भारत सरकार की ‘उदय’ योजना के तहत झारखंड सरकार से मिले 6,13,637 लाख रुपये के लोन को इक्विटी और ग्रांट (अनुदान) में बदला गया था. नियमों के मुताबिक, इस ग्रांट की रकम को तय वित्तीय मानकों के तहत बही-खाते में दर्शाया जाना था, लेकिन जेबीवीएनएल ने 4,14,238.98 लाख रुपये की भारी राशि को सीधे ‘क्लेम रिसीवेबल्स’ और ‘रीस्ट्रक्चरिंग अकाउंट’ के सामने एडजस्ट कर दिया. इस अकाउंटिंग बाजीगरी पर ऑडिटर्स ने कड़ा ऐतराज जताया है.
कर्मचारियों के भविष्य और सप्लायर्स के पैसों से खिलवाड़
कर्मचारियों के रिटायरमेंट बेनिफिट्स के लिए बनाए गए ‘मास्टर ट्रस्ट’ के खातों का सालों से मिलान नहीं हुआ है. इसके अलावा, सप्लायर्स और ठेकेदारों के 3,733 करोड़ रुपये से अधिक के ट्रेड पेबल्स बिना किसी रीकंसिलेशन या बैलेंस कन्फर्मेशन के छोड़ दिए गए हैं. जब तक इन खातों का संयुक्त मिलान नहीं होता, तब तक यह कह पाना असंभव है कि कंपनी की वास्तविक वित्तीय देनदारी कितनी है. ठेकेदारों की ‘कीप बैक’ डिपॉजिट और पेनाल्टी की रकम (करीब 1,288 करोड़ रुपये) का भी पार्टी-वार ब्योरा पूरी तरह स्पष्ट नहीं है.
ऑडिट रिर्पोट की फैक्ट फाइल
• 530 करोड़ की कागजी बाजीगरी व कैग ने पकड़ी चोरी.
• छुपाई गई राशि में 530.42 करोड़ (लेट पेमेंट सरचार्ज / विलंब शुल्क)
• ऊर्जा संचरण और टीवीएनएल द्वारा क्लेम किए गए 530.42 करोड़ के सरचार्ज को बही-खाते से गायब कर दिया ताकि कागजों पर घाटा कम दिखें.
• खातों में 2,690 करोड़ का ‘अदृश्य’ अंतर
• वितरण निगम का दावा 4,577.18 करोड़, जबकि सप्लायर कंपनियों का दावा 7,267.57 करोड़, 2,690.39 करोड़ का हिसाब नहीं
• उधारी वसूली में नाकामी, 3,300 करोड़ डूबने की कगार पर.
• कुल बकाया 8,702.57 करोड़
• संदेहास्पद कर्ज 3,308.61 करोड़ (वह पैसा जिसकी वसूली की उम्मीद खुद विभाग को नहीं है)
• उदय योजना में हेरफेर : 4,142 करोड़ की वित्तीय बाजीगरी,केंद्र सरकार की ‘उदय’ योजना के तहत झारखंड सरकार से मिले 6,13,637 लाख के लोन को इक्विटी और ग्रांट (अनुदान) में बदला गया था.
• नियमों को ताक पर रखकर वितरण निगम 4,14,238.98 लाख (करीब ₹4,142 करोड़) की भारी राशि को सीधे ‘क्लेम रिसीवेबल्स’ और ‘रीस्ट्रक्चरिंग अकाउंट’ में एडजस्ट कर दिया ताकि बैलेंस शीट को कृत्रिम रूप से ठीक दिखाया जा सके. ऑडिटर्स ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है.
• ठेकेदारों और सप्लायर्स के 3,733 करोड़ से अधिक के ट्रेड पेबल्स बिना किसी बैलेंस कन्फर्मेशन या मिलान के छोड़ दिए गए हैं.
• कर्मचारियों के रिटायरमेंट बेनिफिट्स के लिए बने ‘मास्टर ट्रस्ट’ के खातों का सालों से रिकॉन्सिलिएशन (मिलान) नहीं हुआ है.
• ठेकेदारों की ‘कीप बैक’ डिपॉजिट और पेनाल्टी की करीब 1,288 करोड़ की राशि का पार्टी-वार कोई स्पष्ट ब्यौरा नहीं है.
• सब-डिवीजन स्तर पर उपभोक्ताओं के खातों का मुख्य खातों से मिलान न होने के कारण करोड़ों रुपये की बिलिंग और कलेक्शन की राशि बिना पहचान के ‘सस्पेंस अकाउंट’ में डाल दी गई है. जिससे वित्तीय धोखाधड़ी का खतरा है.
• राज्य सरकार से मिलने वाली बिजली सब्सिडी के दावों और वास्तविक प्राप्ति का लेखा-जोखा लचर होने के कारण निगम हमेशा नकदी के संकट से जूझता रहता है.
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