Jamshedpur: पूर्वी सिंहभूम के आदिवासी बहुल डुमरिया प्रखंड के पहाड़ी गांव लाखाईडीह में पारंपरिक हर्बल चिकित्सा और स्थानीय औषधीय वनस्पतियों के वैज्ञानिक अध्ययन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई है. आईआईटी मुंबई के पूर्व प्रोफेसर और चिकित्सा अनुसंधान से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. देवतोष दत्ता ने गांव पहुंचकर ग्राम प्रधान कान्हु राम टुडू और ग्रामीणों से मुलाकात की. इस दौरान उन्होंने वर्षों से संरक्षित आदिवासी पारंपरिक उपचार पद्धतियों और औषधीय पौधों के उपयोग से जुड़ी जानकारी जुटाई.
‘औषधीय वनस्पतियों के लिहाज से काफी समृद्ध क्षेत्र’
डॉ. देवतोष दत्ता ने कहा कि लाखाईडीह और आसपास का क्षेत्र जैव विविधता और औषधीय वनस्पतियों के लिहाज से काफी समृद्ध है. यहां पाई जाने वाली कई दुर्लभ जड़ी-बूटियां आधुनिक चिकित्सा अनुसंधान के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं. उन्होंने कहा कि इन वनस्पतियों का वैज्ञानिक परीक्षण और दस्तावेजीकरण किया जाए तो चिकित्सा विज्ञान को नई संभावनाएं मिल सकती हैं और पारंपरिक ज्ञान को वैश्विक पहचान भी हासिल हो सकती है.
डुमरिया क्षेत्र में मेडिसिन रिसर्च की अपार संभावनाएं
उन्होंने बताया कि डुमरिया क्षेत्र में मेडिसिन रिसर्च की अपार संभावनाएं हैं. यदि सरकारी एजेंसियों और शोध संस्थानों का सहयोग मिले तो यह क्षेत्र भविष्य में औषधीय अनुसंधान का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है.वहीं, ग्राम प्रधान कान्हु राम टुडू ने वैज्ञानिक दल का पारंपरिक रीति-रिवाज से स्वागत किया. उन्होंने कहा कि गांव के लिए यह पहला अवसर है, जब कोई शोधकर्ता दल स्थानीय चिकित्सा परंपरा को समझने और उसका वैज्ञानिक अध्ययन करने पहुंचा है. उन्होंने बताया कि ग्रामीणों ने पीढ़ियों से संजोए गए औषधीय ज्ञान को शोध दल के साथ साझा किया है और आगे भी हरसंभव सहयोग करने का भरोसा दिया है. इस अवसर पर डॉ. देवतोष दत्ता के साथ अनिर्बान चौधरी, राकेश जैन, शेख शेरियल, भैरव महाराज और सत्य प्रकाश मौजूद रहे.
