Ranchi: झारखंड सचिवालय सेवा संघ की आमसभा रविवार को हटिया स्थित पशुपालन भवन में हुई. इसमें जो बातें समाने उभर कर आईं उसमें यह है, कि सचिवालय सेवा अब अपनी गरिमा के साथ हो रहे खिलवाड़ को और अधिक बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है. बैठक में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि विभाग के मौजूदा कार्मिक सचिव का रवैया न केवल तानाशाही पूर्ण है, बल्कि यह सचिवालय सेवा के कैडर हितों को ध्वस्त करने वाला है.
पदोन्नति नियमावली में हो रहा मनमाने ढ़ंग से संशोधन
संघ के पदाधिरकारियों ने आरोप लगाया कि पदोन्नति नियमावली में जिस तरह से मनमाने संशोधन किए जा रहे हैं, उससे अधिकारियों का मनोबल रसातल में चला गया है. यह सिर्फ फाइलों का मामला नहीं है, यह सम्मान और अधिकार का प्रश्न है. अधिकारियों का साफ कहना है कि सचिव के निर्णय एक सोची-समझी रणनीति के तहत सचिवालय सेवा की रीढ़ तोड़ने के लिए लिया जा रहा है. अधिकारियों ने कहा कि हम मशीन नहीं हैं, जो आपके गलत फैसलों पर दस्तखत करते रहें. यदि हमारी गरिमा और अधिकारों पर प्रहार होगा, तो इसका जवाब सड़क से लेकर सदन तक दिया जाएगा.
कई प्रस्ताव पारित किए गए
आम सभा में सर्वसम्मति से संगठन को प्रशासनिक और वित्तीय रूप से मजबूत करने के प्रस्ताव पारित किए गए. अब संघ के सदस्यों से 200 रुपये मासिक या 2400 रुपये वार्षिक सदस्यता शुल्क लिया जाएगा. यह राशि किसी मानवीय चूक के भरोसे नहीं, बल्कि ‘स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शन’के माध्यम से सीधे ली जाएगी. संगठन की पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए संघ के खातों का ऑडिट कराने का अधिकार कार्यकारिणी को दिया गया है. सदस्यों के दुख-सुख में ढाल बनकर खड़ा होने के लिए ‘संघ कल्याण कोष नियमावली’ को भी हरी झंडी दिखा दी गई है.
कोषाध्यक्ष पद का पुनर्गठन
संगठन के भीतर ऊर्जा का संचार करने के लिए एक महत्वपूर्ण फेरबदल भी हुआ. स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर कोषाध्यक्ष अवध किशोर भगत ने इस्तीफा दे दिया, जिसे आम सभा ने स्वीकार कर लिया. संघ की सक्रियता को देखते हुए कार्यकारिणी के संयुक्त सचिव हेम नारायण सिंह को नया कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया है.
अब बातचीत नहीं, संघर्ष होगा
बैठक में यह तय हुआ कि यदि सरकार ने सचिवालय सेवा के हितों की अनदेखी जारी रखी, तो हड़ताल का रुख अख्तियार किया जाएगा. संघ ने सरकार को यह स्पष्ट संदेश भेज दिया है, कि सचिवालय सेवा के अधिकारियों के संवैधानिक अधिकारों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा. राज्य के मुख्यमंत्री, संबंधित मंत्री और मुख्य सचिव तक अपनी बात पहुंचाने के लिए जल्द ही एक प्रतिनिधिमंडल मिलेगा. यदि उनकी जायज मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से किया जाएगा.
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