Ranchi: जिस व्यवस्था की कमान देश के सबसे तेज-तर्रार और अनुशासित समझे जाने वाले आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के हाथों में हो, पर कमान बेदम निकली. झारखंड के युवाओं के सपनों को पंख देने की जिम्मेदारी जिस जेएसएससी पर थी, उसकी कमान समय-समय पर राज्य के सर्वोच्च प्रशासनिक पदों पर बैठे दिग्गजों के हाथों में सौंपी गई. यह उम्मीद थी कि खाकी का खौफ और आईएएस की कार्यकुशलता आयोग की तस्वीर बदल देगी, लेकिन हर बार नतीजा सिर्फ और सिर्फ सिफर रहा.

आयोग की कुर्सी संभालने वाले प्रमुख चेहरे
- मृदुला सिन्हा (सेवानिवृत्त आईएएस): आयोग की प्रथम अध्यक्ष, जिनके कार्यकाल से ही विवादों की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी.
- सुधीर त्रिपाठी (सेवानिवृत्त आईएएस): नवंबर 2020 में कमान संभाली, लेकिन व्यवस्था को पटरी पर लाने में पूरी तरह नाकामयाब रहे.
- नीरज सिन्हा (पूर्व डीजीपी): सितंबर 2023 में एक आईपीएस अधिकारी के हाथों में कमान आने से यह उम्मीद जगी थी कि नकलचियों और माफियाओं पर हंटर चलेगा, लेकिन पेपर लीक के काले कारनामों ने अंततः उन्हें घुटने टेकने और इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया.
- डॉ. मनीष रंजन (आइएएस): अप्रैल 2025 में अध्यक्ष पद संभाला, लेकिन विफलता का यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं लिया.
- प्रशांत कुमार (आइएएस): वर्तमान में इस खस्ताहाल और बीमार व्यवस्था के प्रभारी अध्यक्ष के रूप में जिम्मा संभाल रहे हैं, जिनके सामने आयोग की साख बचाना सबसे बड़ी चुनौती है.
जेएसएससी के वे कारनामे, जिन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोल दी
फील्ड वर्कर प्रतियोगी परीक्षा 2024: लापरवाही की हदें पार
विज्ञापन जारी होने के पूरे दो साल बाद 19 जुलाई को यह परीक्षा कराई गई, जो खुद में एक रिकॉर्ड है. प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह था कि अभ्यर्थियों को उनके गृह जिलों से 300 से 550 किलोमीटर दूर परीक्षा केंद्र थमा दिए गए.राज्य में यातायात के बदहाल साधनों और तकनीकी कुव्यवस्था के कारण 75% से अधिक अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल तक नहीं हो सके. हद तो तब हो गई जब कई उम्मीदवारों को परीक्षा हॉल के भीतर या परीक्षा समाप्त होने के बाद ईमेल पर एडमिट कार्ड के संदेश मिले! वहीं, संताली भाषा के पेपर में पाठ्यक्रम से बाहर के सवालों और भारी त्रुटियों ने आग में घी का काम किया, जिससे छात्रों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया.
उत्पाद सिपाही नियुक्ति परीक्षा 2023: लीक हुआ पेपर, टूटी साख
इस परीक्षा के दौरान प्रश्नपत्र लीक होने के इतने गंभीर और पुख्ता प्रमाण सामने आए कि शासन-प्रशासन के होश उड़ गए. मामला इतना तूल पकड़ा कि रांची पुलिस को ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए 150 से अधिक छात्रों और दलालों को गिरफ्तार करना पड़ा. तत्कालीन डीजीपी और जेएसएससी अध्यक्ष नीरज सिन्हा के कार्यकाल में हुआ यह पेपर लीक महकमे की साख पर एक ऐसा बदनुमा दाग है, जिसे कभी धोया नहीं जा सकता.
जेएसएससी-सीजीएल : अराजकता, इंटरनेट बंदी और अदालतों की दौड़
जेएसएससी-सीजीएल का इतिहास अब निष्पक्षता का नहीं, बल्कि धांधली और भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुका है. परीक्षा के दौरान पेपर लीक की अफवाहों और घपलेबाजी के खिलाफ जब युवाओं का हुजूम सड़कों पर उतरा, तो पूरा तंत्र हिल गया. हालात इतने भयावह हो गए कि सरकार को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरे राज्य में इंटरनेट सेवाएं तक ठप करनी पड़ीं. यह नाकामी झारखंड उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गूंजी, जिससे पूरे देश में झारखंड की प्रशासनिक व्यवस्था की जगहसाई हुई. अंततः इस नाकामी की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तत्कालीन अध्यक्ष एवं पूर्व डीजीपी नीरज सिन्हा को मुख्य सचिव को अपना इस्तीफा सौंपना पड़ा.

