Hazaribagh: जनगणना-2027 के पहले चरण के तहत चल रहे मकान सूचीकरण एवं मकान गणना कार्य के दौरान कई तरह की व्यावहारिक और तकनीकी चुनौतियां सामने आ रही हैं. एक ओर प्रगणकों द्वारा पूछे जा रहे कुछ सवाल आम लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सूचीकरण के लिए उपयोग किए जा रहे एचएलओ (हाउस लिस्टिंग ऑपरेशन) ऐप की तकनीकी खामियां आंकड़ों की शुद्धता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही हैं.

रेडियो वाले सवाल पर सबसे ज्यादा भ्रम
मकान सूचीकरण के दौरान प्रगणकों को प्रत्येक परिवार से 34 प्रकार की जानकारियां एकत्र करनी हैं. इनमें एक प्रश्न घर में रेडियो की उपलब्धता से जुड़ा है. यहीं से भ्रम की स्थिति शुरू हो रही है. अधिकांश लोग रेडियो शब्द सुनते ही पारंपरिक रेडियो सेट को ध्यान में रखते हैं और सीधे “नहीं” का जवाब दे देते हैं. जबकि एचएलओ ऐप में रेडियो के किसी भी माध्यम से उपयोग को दर्ज करने का प्रावधान है. मोबाइल फोन, कार स्टीरियो या अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के माध्यम से रेडियो सुनने वालों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए. प्रगणकों का कहना है कि लोगों को इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं होने के कारण वास्तविक स्थिति और दर्ज किए जा रहे आंकड़ों में अंतर आने की संभावना बन रही है.
ODF दावों की खुली पोल
मकान सूचीकरण के दौरान कुछ ऐसे तथ्य भी सामने आए हैं, जो सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं. एक प्रगणक ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि शहर से सटे एक प्रखंड के गांव में अनुसूचित जाति समुदाय के 10 से 12 परिवार ऐसे मिले, जिनके घरों में आज भी शौचालय नहीं है. परिवार के सदस्य खुले में शौच करने को विवश हैं. यह तथ्य उस समय सामने आया, जब ऐप में शौचालय संबंधी जानकारी दर्ज की जा रही थी. गौरतलब है कि जिला प्रशासन पूर्व में पूरे हजारीबाग जिले को खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) घोषित कर चुका है. ऐसे में सूचीकरण के दौरान सामने आई यह स्थिति सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर की ओर संकेत करती है.
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प्रशिक्षण से पहले ही लॉगिन पर रोक
सूत्रों के अनुसार, प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान प्रगणकों और पर्यवेक्षकों को एचएलओ ऐप में लॉगिन नहीं करने की सलाह दी गई थी. आशंका थी कि ऐसा करने से उनकी आईडी लॉक हो सकती है. परिणामस्वरूप अधिकांश कर्मियों को ऐप का पर्याप्त व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं मिल सका और उन्हें सीधे फील्ड में कार्य करना पड़ा. कई प्रगणकों का कहना है कि प्रशिक्षण और वास्तविक कार्य के बीच बड़ा अंतर है. ऐप की कई तकनीकी प्रक्रियाओं को समझने में उन्हें कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है.
एक मकान की दो-दो एंट्री का खतरा
प्रगणकों ने ऐप की एक गंभीर तकनीकी समस्या की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है. उनके अनुसार, यदि किसी प्रविष्टि में त्रुटि हो जाती है और उसे हटाकर पुनः दर्ज किया जाता है, तो नया लाइन नंबर स्वतः बदल जाता है. लेकिन पुरानी अधूरी प्रविष्टि सिस्टम में बनी रहती है. इस स्थिति में एक ही मकान की दोहरी प्रविष्टि होने की संभावना बढ़ जाती है. यदि ऐसी त्रुटियां बड़े पैमाने पर हुईं, तो जिले में मकानों की कुल संख्या वास्तविक आंकड़ों से अधिक दर्ज हो सकती है.
पर्यवेक्षकों के सामने भी चुनौती
प्रगणकों का कहना है कि एक बार डेटा दर्ज होने के बाद वह पर्यवेक्षक के लॉगिन में चला जाता है. लेकिन पर्याप्त व्यावहारिक प्रशिक्षण के अभाव में वहां भी त्रुटियों को सुधारना आसान नहीं है. कई मामलों में छोटी-सी तकनीकी गलती को ठीक करने में भी परेशानी हो रही है. इससे अंतिम आंकड़ों की गुणवत्ता और सटीकता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है.
जनगणना के आधारभूत आंकड़ों पर असर की आशंका
जनगणना कार्य में लगे कर्मियों का मानना है कि मकान सूचीकरण जनगणना की आधारभूत प्रक्रिया है. इसी के आधार पर आगे की जनसंख्या गणना और विभिन्न सरकारी योजनाओं की रूपरेखा तय होती है. ऐसे में यदि शुरुआती चरण में ही डेटा संग्रहण में त्रुटियां रह जाती हैं, तो उसका प्रभाव भविष्य की नीतियों और योजनाओं पर भी पड़ सकता है. इसलिए प्रगणकों का सुझाव है कि एचएलओ ऐप की तकनीकी खामियों को शीघ्र दूर किया जाए तथा फील्ड में कार्यरत कर्मियों को अतिरिक्त व्यावहारिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए, ताकि जनगणना-2027 के लिए तैयार हो रहे आंकड़े अधिक सटीक और विश्वसनीय बन सकें.
