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राधाकृष्ण किशोर: झारखंड की राजनीति के ‘गूगल मैप’, जो हर दल का रास्ता जानते हैं

Ravi Bharti Ranchi: झारखंड की सियासत में कुछ किरदार ऐसे होते हैं, जो किसी एक विचारधारा की बेड़ियों में नहीं बंधते. वे...

Ravi Bharti 

Ranchi: झारखंड की सियासत में कुछ किरदार ऐसे होते हैं, जो किसी एक विचारधारा की बेड़ियों में नहीं बंधते. वे राजनीतिक खानाबदोश नहीं, बल्कि अनुभव के पारखी कहे जाते हैं. वर्तमान वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर इसी श्रेणी के शिखर पुरुष हैं. इन दिनों वे फुल फॉर्म में हैं और उनके फॉर्म का शिकार कोई विपक्षी नहीं, बल्कि उनकी अपनी ही पार्टी और गठबंधन की सरकार है.

दलों के गुलदस्ते से निकले मंत्री जी

राधाकृष्ण किशोर का राजनीतिक इतिहास किसी इंद्रधनुष से कम नहीं है. राजद की सामाजिक न्याय वाली लालटेन से लेकर आजसू के चूल्हे तक, भाजपा के कमल से लेकर जदयू के तीर, पहले समता पार्टी और अब कांग्रेस के हाथ तक, उन्होंने लगभग हर राजनीतिक पड़ाव का सफर तय किया है. शायद इसी सर्वधर्म समभाव वाले अनुभव का नतीजा है कि आज वे कांग्रेस के कोटे से मंत्री होकर भी कांग्रेस के ही प्रदेश अध्यक्ष को हटाने तक की सलाह देने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

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450 का वादा और 200 का यथार्थ

ताजा मामला मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लिखे गए उनके चौथे पत्र का है. मामला गैस सिलेंडर का है. 2024 के चुनाव में कांग्रेस ने बड़े जोर-शोर से नारा दिया था ‘भरोसा बरकरार’, फिर गठबंधन सरकार बनी और 450 रुपए में गैस सिलेंडर देने का वादा किया गया. अब वित्त मंत्री जी का कैलकुलेटर जाग गया है. उन्होंने ‘सिलेंडर डिप्लोमेसी’ का ऐसा पासा फेंका कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. उन्होंने सुझाव दिया कि 450 रुपए छोड़िए, 200 रुपए की सब्सिडी दीजिए. इससे गरीब को 770 रुपए में सिलेंडर मिलेगा और सरकार की इज्जत भी बच जाएगी. अब देखना दिलचस्प होगा कि सीएम हेमंत सोरेन इस ‘फ्री हिट’ को कैसे खेलते हैं या फिर वित्त मंत्री का अगला पत्र किसी नए सियासी दल के लिफाफे में बंद होकर आता है.

कुर्सी’ ही सबसे सुरक्षित जगह?

पार्टी में दिक्कत है. सरकार की नीति भी परफेक्ट नहीं है. ठीक है तो सिर्फ कुर्सी. ‘हर कर्म अपना करेंगे ऐ कुर्सी तेरे लिए’ वाली रणनीति पर काम करने वाले राधाकृष्ण किशोर कुछ भी हो जाए, कुर्सी को जाने नहीं देंगे. राजनीति में रुचि रखने वाले कुछ लोगों का कहना है कि अगर किसी एक नेता को अपनी पार्टी और सरकार से इतनी दिक्कत है, तो कम से कम कुर्सी तो छोड़ देनी चाहिए. लेकिन राधाकृष्ण किशोर ऐसा कतई नहीं करेंगे.

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