Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 2017 में दाखिल एक आपराधिक याचिका करीब आठ साल तक सूचीबद्ध नहीं होने पर गंभीर नाराजगी जताई है. कोर्ट ने कहा कि पूरी न्यायिक व्यवस्था वादियों के हित के लिए है. ऐसे में वर्षों तक किसी मामले का सूचीबद्ध नहीं होना उचित नहीं है. अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल को उन मामलों की जानकारी जुटाकर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है, जो वर्षों से सूचीबद्ध नहीं हुए हैं. जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने श्रीकांत राय बनाम झारखंड सरकार एवं अन्य से जुड़े मामले में यह आदेश दिया है.

रजिस्ट्री की ओर से जरूरी सतर्कता में कमी
यह याचिका वर्ष 2017 में दाखिल की गई थी. हाईकोर्ट की रजिस्ट्री की ओर से अदालत को बताया गया कि लंबित फाइलों के भौतिक सत्यापन के दौरान गर्मी की छुट्टियों में इस मामले की फाइल मिली. फाइल क्रिमिनल डिस्पोजल सेक्शन में पड़ी थी. इसे 16 जून 2026 को संबंधित क्रिमिनल मिसलेनियस पिटीशन सेक्शन को भेजा गया जिसके बाद मामले को पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया शुरू की गई. खंडपीठ ने रजिस्ट्री के स्पष्टीकरण पर असंतोष जताया. कोर्ट ने कहा कि याचिका वर्ष 2017 में दाखिल हुई थी और गर्मी की छुट्टियों के दौरान भौतिक सत्यापन में इसकी फाइल मिलने की बात रजिस्ट्री की ओर से जरूरी सतर्कता नहीं बरते जाने को दर्शाती है.

केवल माफी मांगना पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं
अदालत ने सवाल उठाया कि याचिका दाखिल होने के तुरंत बाद इसे लवाजिमा बोर्ड या संबंधित पीठ के समक्ष क्यों सूचीबद्ध नहीं किया गया इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल माफी मांगना पर्याप्त स्पष्टीकरण नहीं माना जा सकता क्योंकि करीब आठ साल तक मामला सूचीबद्ध नहीं होने से वादी का मामला गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है.

आदेश पारित करने से पहले ऐसे मामलों की जानकारी जरूरी
हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को यह पता लगाने का निर्देश दिया है कि गर्मी की छुट्टियों के दौरान मिली फाइलों में ऐसे कितने मामले हैं जिन्हें अब तक सूचीबद्ध नहीं किया गया है. साथ ही कोर्ट ने उन मामलों का भी पूरा ब्योरा मांगा है, जो वर्षों से सूचीबद्ध नहीं हुए हैं. अदालत ने कहा कि आगे का आवश्यक आदेश पारित करने से पहले ऐसे मामलों की जानकारी जरूरी है.

