CCL अधिकारी ने CBI से बचने के लिए कहा ब्रिटेन के रिश्तेदारों ने दिए गिफ्ट, दिल्ली, मुंबई, कानपुर और सूरत तक इन्वेस्ट थी ब्लैक मनी, पढ़िए आय से अधिक संपत्ति का सुलझा हुआ केस

विनीत आभा उपाध्याय ​Ranchi: रांची सिविल कोर्ट स्थित विशेष CBI अदालत ने CCL के पूर्व अधिकारी स्वर्गीय शंकर कुमार अग्रवाल से जुड़े...

CCL official
To evade the CBI, a CCL official claimed the funds were gifts from relatives in the UK (AI IMAGE)

विनीत आभा उपाध्याय

​Ranchi: रांची सिविल कोर्ट स्थित विशेष CBI अदालत ने CCL के पूर्व अधिकारी स्वर्गीय शंकर कुमार अग्रवाल से जुड़े 24 साल पुराने आय से अधिक संपत्ति के चर्चित मामले में फैसला सुना दिया है. अदालत ने इस मामले में सह-आरोपी और दिवंगत अधिकारी की पत्नी रजनी अग्रवाल को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं भारतीय दंड संहिता की धारा अलग-अलग धाराओं के तहत दोषी ठहराया है. अदालत ने उन्हें 3 वर्ष के कठोर कारावास और 25 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि जुर्माना न देने पर 1 वर्ष का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा. फैसले के तुरंत बाद अदालत ने रजनी अग्रवाल का जमानत बांड रद्द करते हुए उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

​कैसे अर्जित की गई अवैध संपत्ति?

CBI  द्वारा केस संख्या R.C. 10(A)/2002-R के तहत तैयार की गई विस्तृत जांच रिपोर्ट और अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों के मुताबिक 13 नवंबर 1987 से 9 अगस्त 2002 के बीच आरोपी पक्ष ने अपने ज्ञात और वैध आय स्रोतों से कहीं अधिक संपत्ति अर्जित की. जांच अवधि के दौरान परिवार की कुल वैध स्रोतों से आय 42,02,465.37 रुपए दर्ज की गई जबकि घरेलू खर्च 16,65,025.83 आंका गया था. इसके साथ ही इसी अवधि में आरोपी पक्ष ने 1,05,08,697.41 रुपए की विशाल चल-अचल संपत्ति खड़ी कर ली. अवैध कमाई का बड़ा हिस्सा पीपीएफ (PPF) खातों, रिलायंस और एस्सार ऑयल जैसे शेयर बाजार के स्टॉक, एलआईसी (LIC) पॉलिसियों, यूटीआई (UTI) व SBI म्यूचुअल फंड, RBI रिलीफ बांड और बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FDR) में निवेश किया गया. इसके अलावा धनबाद के सुमित्रा अपार्टमेंट में फ्लैट (203A) और रांची के वर्धमान कंपाउंड में जमीन रजनी अग्रवाल के नाम पर खरीदी गई थी. बच्चों की स्कूल फीस, कार और रांची क्लब की सदस्यता में भी भारी धन खर्च किया गया.

CMPDI के पूर्व डिप्टी GM की गवाही से खुला राज

CMPDI के पूर्व डिप्टी जीएम की गवाही से यह खुलासा हुआ कि शंकर कुमार अग्रवाल ने 1987 से 1998 के बीच अपनी संपत्ति रिटर्न और महंगे उपहारों की कोई अनिवार्य विभागीय जानकारी नहीं दी थी. बचाव पक्ष के झूठे दावे और CBI की कार्रवाई खुद को और परिवार को कानूनी शिकंजे से बचाने के लिए बचाव पक्ष ने अदालत में 10 गवाह पेश किए और कई दावे किए जिन्हें CBI की गहन जांच और गवाहों के बयानों ने झूठा व बेबुनियाद साबित कर दिया. बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि उन्हें ब्रिटेन (UK) में रहने वाले रिश्तेदारों से उपहार के रूप में विदेशी मुद्रा मिली थी. इस मामले के ट्रायल के दौरान CBI की ओर से विशेष लोक अभियोजक खुशबू जायसवाल ने एजेंसी का पक्ष रखा. हालांकि, सरकारी सेवा में रहते हुए ऐसे किसी भी विदेशी उपहार की अनिवार्य विभागीय सूचना नहीं दी गई थी जिससे यह स्पष्ट रूप से अवैध धन को छिपाने का प्रयास साबित हुआ.

ट्यूशन और शेयर ट्रेडिंग से कमाई का दावा खारिज

इतना ही नहीं अवैध तरीके से कमाए गए पैसे को छुपाने के लिए रजनी अग्रवाल ने खुद को स्वतंत्र कारोबारी बताते हुए दावा किया कि उन्होंने ट्यूशन पढ़ाने और शेयर ट्रेडिंग से यह धन कमाया था. हालांकि CBI की ओर से पेश हुए गवाहों ने स्पष्ट गवाही दी कि उन्होंने रजनी अग्रवाल को घर पर कभी कोई ट्यूशन या कोचिंग क्लास चलाते नहीं देखा. विभिन्न बैंकों से लोन लेने का हवाला देकर धन की वैधता साबित करने की कोशिश की गई, लेकिन सीबीआई द्वारा दिल्ली, मुंबई, कानपुर और सूरत तक किए गए पूरक अनुसंधान और बैंक प्रबंधकों के आधिकारिक दस्तावेजों ने वित्तीय हेरफेर की पोल खोल दी.

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