विनीत आभा उपाध्याय

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने मोहम्मद लॉ (मुस्लिम कानून) के तहत वैवाहिक अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें एक महिला को अपने पति के साथ वापस रहने का निर्देश दिया गया था. अपने फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर आसपास की परिस्थितियां यह दर्शाती हैं कि महिला को वापस भेजना अन्यायपूर्ण और अनुचित होगा तो अदालतें उसे वैवाहिक घर लौटने के लिए बाध्य नहीं कर सकती. झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने पत्नी की अपील को स्वीकार करते हुए गिरिडीह फैमिली कोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया जिसमें पति को मुल्ला के प्रिंसिपल्स ऑफ मोहम्मद लॉ की धारा 281 के तहत दंपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की राहत दी गई थी.

पत्नी ससुराल वालों के खिलाफ दर्ज कराया आपराधिक मामला
यह विवाद रानी परवीन और मोहम्मद मुबारक अंसारी के बीच का है जिनका विवाह 2013 में मुस्लिम रीति-रिवाजों से हुआ था. पति ने फैमिली कोर्ट में यह तर्क देते हुए याचिका दायर की थी कि उसकी पत्नी बिना किसी वैध कारण के वैवाहिक घर छोड़कर चली गई है और बार-बार प्रयासों के बावजूद लौटने से मना कर रही है. वहीं पत्नी ने आरोप लगाया कि उसके साथ पति और उसके परिवार द्वारा शारीरिक मारपीट, क्रूरता और प्रताड़ना की गई. उसने उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया था और काजी के माध्यम से खुला भी प्राप्त कर लिया था.

सिर्फ तकनीकी साक्ष्यों तक सीमित नहीं रह सकता फैमिली कोर्ट
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मुस्लिम कानून में विवाह एक नागरिक अनुबंध है. हालांकि पति वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना की मांग कर सकता है लेकिन यह राहत स्वतः नहीं मिलती. अदालतों को पहले यह देखना होगा कि क्या पत्नी के पास अलग रहने का कोई वैध कारण है. जहां क्रूरता, घरेलू हिंसा या उत्पीड़न के आरोप पति पत्नी के साथ रहने को असुरक्षित बनाते हैं वहां अदालतों को पत्नी को वापस भेजने से इनकार करना चाहिए. फैमिली कोर्ट को केवल साक्ष्य के सख्त तकनीकी नियमों पर भरोसा करने के बजाय वैवाहिक विवादों के अंतर्निहित कारणों और संपूर्ण परिस्थितियों को समझना चाहिए. अदालत ने माना कि गिरिडीह फैमिली कोर्ट का आदेश अनुचित था. इसलिए खंडपीठ ने गिरिडीह सिविल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह से निरस्त कर दिया.

