News Wave Desk: वट सावित्री व्रत क्या है? वट सावित्री व्रत भारत में विवाहित हिंदू महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह हर साल ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को, यानी मई-जून में मनाया जाता है. इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए व्रत रखती हैं और वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं. कुछ राज्यों में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के नाम से भी मनाया जाता है.
व्रत के पीछे की पौराणिक कथा

इस व्रत का संबंध सावित्री और सत्यवान की कथा से है. सावित्री एक पतिव्रता स्त्री थीं. जब यमराज उनके पति सत्यवान के प्राण लेने आए, तो सावित्री ने अपनी बुद्धि और भक्ति से यमराज को प्रसन्न कर लिया. सावित्री ने यमराज का पीछा किया और उनसे अपने पति के जीवन का वरदान मांग लिया. यह पूरी घटना वट वृक्ष के नीचे घटी थी. इसलिए महिलाएं बरगद के पेड़ को सावित्री का स्वरूप मानकर पूजती हैं.

बरगद के पेड़ का महत्व

बरगद का पेड़ सनातन धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है. इसे त्रिदेव -ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है. इसकी जड़ें ब्रह्मा, तना विष्णु और शाखाएं शिव का रूप हैं. बरगद सैकड़ों साल तक जीवित रहता है और इसकी जटाएं जमीन में जाकर नए तने बनाती हैं। यह दीर्घायु, अखंडता और जीवन चक्र का प्रतीक है. इसलिए महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए इसकी पूजा करती हैं.
पूजा की विधि

सुबह स्नान करके महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं. लाल, पीली या हरी साड़ी, चूड़ियां, बिंदी और सिंदूर लगाती हैं. पूजा की थाली में जल, रोली, मौली, चावल, भीगे चने, गुड़, फल और मिठाई रखती हैं. बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री-सत्यवान की मूर्ति रखकर पूजा करती हैं. फिर कच्चे सूत को पेड़ के तने पर लपेटते हुए 7 या 108 बार परिक्रमा करती हैं. अंत में व्रत की कथा सुनती हैं और बड़ों का आशीर्वाद लेती हैं.
कहाँ मनाया जाता है
यह व्रत खासतौर पर महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पंजाब में बड़े उत्साह से मनाया जाता है. यह पर्व पति-पत्नी के प्रेम, त्याग और समर्पण का प्रतीक है.
