NEWS DESK: लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है. अदालत ने अलग-अलग धर्म वाले कपल के अधिकारों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि वह अलग-अलग धर्म के कपल को हिंदू या मुसलमान के रूप में नहीं, बल्कि दो Adults के रूप में देखती है. ये लोग अपनी खुशी और इच्छा से साथ में रह रहे हैं. कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान ऐसे कपल और लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों की सुरक्षा करता है.
जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने एक इंटरफेथ कपल की याचिका पर सुनवाई की. कपल ने बताया कि उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर डर है. पुलिस उनकी बातों पर ध्यान नहीं दे रही. इसलिए उन्होंने कोर्ट में याचिका दायर की.
कोर्ट ने कहा कि धर्म की परवाह किए बिना किसी व्यक्ति के अपनी पसंद के साथी के साथ रहने का अधिकार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है. किसी के रिश्तों में जबरदस्ती हस्तक्षेप करना गलत है.
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कानून दो Adults को साथ रहने की अनुमति देता है. तो कोई व्यक्ति, परिवार या राज्य उनके आपसी सहमति से रहने पर रोक नहीं लगा सकता.
कोर्ट ने कहा कि हर नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा राज्य का कर्तव्य है. धार्मिक विश्वासों की परवाह किए बिना, हर व्यक्ति को अपनी पसंद के साथी के साथ जीवन जीने का अधिकार है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट पहले भी लिव-इन रिलेशनशिप और विवाहित लोगों के मामलों में चर्चा में रही है. एक फैसले में कहा गया कि एक विवाहित व्यक्ति अपने पति या पत्नी से तलाक लिए बिना किसी तीसरे व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकता.
एक अन्य फैसले में कोर्ट ने कहा कि एक विवाहित पुरुष का किसी Adult महिला के साथ सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कानून के तहत अपराध नहीं है. कोर्ट ने कहा कि सामाजिक राय और नैतिकता इस मामले में निर्णय तय नहीं करेंगी.
