रांची: झारखंड में वर्तमान में 230 से अधिक परियोजनाएं ऐसी हैं, जिनके लिए वन विभाग की मंजूरी अनिवार्य है. लेकिन विभिन्न तकनीकी और कानूनी कारणों से ये सभी प्रोजेक्ट्स रुके हुए हैं. अनुमान के मुताबिक, इन प्रोजेक्ट्स की कुल लागत 20,000 करोड़ रुपये से अधिक है. इनमें से अकेले कोयला और लौह अयस्क खनन से जुड़े प्रोजेक्ट्स ही लगभग 12,000 करोड़ रुपये के हैं. यदि इन परियोजनाओं को मंजूरी मिल जाती है, तो राज्य को सालाना 3,000 करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सकता है.
झारखंड सरकार ने वन नीति 2026 के माध्यम से इन प्रक्रियाओं को सरल बनाने और ‘क्विक रिस्पॉन्स टीम’ के जरिए समस्याओं के समाधान का दावा किया है.
ये प्रमुख प्रोजेक्ट्स जो फॉरेस्ट क्लीयरेंस में अटके हैं
चित्रा ईस्ट ओसीपी: ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL), निवेश 3,500 करोड़, 113.94 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन लंबित
मगध एवं आम्रपाली विस्तार: निवेश 5,000 करोड़, हाथियों के कॉरिडोर और डेंस फॉरेस्ट का मुद्दा
कोलेबिरा-कामडारा लाइन: झारखंड ऊर्जा संचरण निगम, 450 करोड़, 132 केवी लाइन के लिए वन भूमि की मंजूरी लंबित
रुंगटा माइन्स (गोल्ड डिपॉजिट): निवेश 1,200 करोड़, परासी गोल्ड डिपॉजिट हेतु 11.95 हेक्टेयर वन भूमि
एनएच-320 जी अपग्रेडेशन: 800 करोड़, हाटगमहरिया-मनोहरपुर सड़क का वन क्षेत्र में होना
हंसडीहा-जसीडीह लाइन: 320 करोड़, ट्रांसमिशन लाइन के लिए वन भूमि का पेंच
सेक्टर-वार स्थिति: कहां कितनी रुकावट
खनन: सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र. सीसीएल और बीसीसीएल की कई खदानों का विस्तार वन भूमि के कारण रुका हुआ है. पारासी में सोने की खदान का काम भी फॉरेस्ट क्लीयरेंस की वजह से आगे नहीं बढ़ पा रहा है.
सड़क एवं परिवहन: झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम और लातेहार जिलों में कई सड़कों का चौड़ीकरण रुका हुआ है, क्योंकि ये क्षेत्र घने जंगलों या अभयारण्यों (दालमा या पलामू टाइगर रिजर्व) के करीब हैं.
ऊर्जा: नई सब-स्टेशन और ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के काम में वन विभाग की स्टेज-वन या स्टेज-टू क्लीयरेंस न मिलने से बिजली आपूर्ति के लक्ष्य प्रभावित हो रहे हैं.
देरी के प्रमुख कारण
मुआवजा वनीकरण.नियमतः जितनी वन भूमि ली जाती है, उतनी ही जमीन पर पेड़ लगाने के लिए गैर-वन भूमि देनी होती है. राज्य में उपयुक्त गैर-वन भूमि की कमी एक बड़ी बाधा है.
ग्राम सभा की एनओसी: पेसा कानून के तहत आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है, जिसे प्राप्त करने में महीनों लग जाते हैं.
वन्यजीव संरक्षण: हाथियों के कॉरिडोर और बाघों के संरक्षण क्षेत्र के कारण पर्यावरण मंत्रालय मानकों में कोई ढील नहीं देता.
