रांची: झारखंड में वज्रपात का कहर देश के अन्य राज्यों की तुलना में अधिक है. आपदा प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार राज्य गठन के बाद से अब तक लगभग 5000 लोगों की मौत वज्रपात के कारण हो चुकी है, जिनमें सर्वाधिक संख्या किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले मजदूरों की है.
मौतों का खौफनाक आंकड़ा: हर साल 250 से 300 की जाती है जान
झारखंड में हर साल ठनका गिरने से औसतन 250 से 300 लोगों की जानें जाती हैं. ठनका गिरने से अपनी जान गंवाते हैं. एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 तक ही यह आंकड़ा 3,370 को पार कर चुका था. 2021 से 2026 के बीच हुई मौतों को मिलाकर यह संख्या 5,000 के करीब पहुंच गई है. साल 2025 में मानसून के दौरान बिजली गिरने से रिकॉर्ड 186 लोगों की मौत हुई.
घायलों की संख्या की स्पष्ट जानकारी नहीं
मौतों के मुकाबले घायलों की संख्या का कोई सटीक एकीकृत सरकारी डेटा उपलब्ध नहीं है, लेकिन अनुमान के मुताबिक मौतों की तुलना में घायलों की संख्या 3 से 4 गुना अधिक होती है. इनमें से कई लोग जीवनभर के लिए दिव्यांग हो जाते हैं. सरकार ने मौतों को कम करने के लिए दामिनी मोबाइल ऐप लांच किया है, जो 20 से 40 मिनट पहले चेतावनी देता है. साथ ही, अब नए सरकारी भवनों और पंचायत सचिवालयों में तड़ित चालक लगाना अनिवार्य कर दिया गया है.
झारखंड में वज्रपात को राज्य विशिष्ट आपदा घोषित किया है
झारखंड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के नियमों के अनुसार, वज्रपात को ‘राज्य विशिष्ट आपदा’ घोषित किया गया है. इसके तहत मुआवजे का प्रावधान किए गए हैं. इसमें मृतक के आश्रित को 4 लाख रुपये का अनुग्रह अनुदान दिया जाता है. चोट की गंभीरता के आधार पर 4,300 से लेकर 2 लाख तक का प्रावधान है. दुधारू पशुओं (गाय व भैंस) की मौत पर 37,500 और बकरीव भेड़ की मौत पर 4,000 रुपए प्रति पशु का मुआवजा का प्रावधान है.
मुआवजे की जमीनी हकीकत: कागजी फेर में फंसे परिवार
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट की अनिवार्यता: ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल दूर होने के कारण कई बार शव का पोस्टमार्टम नहीं हो पाता, जिससे दावा खारिज हो जाता है.
- एफआईआर में देरी: वज्रपात की घटना के बाद तत्काल पुलिस सूचना और अंचल अधिकारी की रिपोर्ट मिलने में देरी.
- जागरूकता का अभाव: कई परिवारों को यह पता ही नहीं होता कि वे मुआवजे के हकदार हैं.
