मौत से पहले माओवादी नेता प्रशांत बोस का मिसिर बेसरा को लिखा अंतिम पत्र, क्या अब थम जाएगा सशस्त्र संघर्ष का दौर?

रांची: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के शीर्ष नेता रहे प्रशांत बोस उर्फ किशन दा की रांची जेल में तीन अप्रैल को मौत...

रांची: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के शीर्ष नेता रहे प्रशांत बोस उर्फ किशन दा की रांची जेल में तीन अप्रैल को मौत हो गई थी. मौत के बाद सामने आए एक गोपनीय पत्र ने सुरक्षा एजेंसियों और नक्सली गलियारों में हलचल पैदा कर दी है. जेल में रहने के दौरान अपनी मृत्यु से पहले किशन दा द्वारा लिखा गया यह पत्र संगठन की वर्तमान बदहाली और भविष्य की अनिश्चितता को उजागर करता है. यह पत्र 20 मार्च को लिखा गया था. इस पत्र ने माओवादी विचारधारा के उस कोर सिद्धांत पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसे संगठन दशकों से ढोता आ रहा है. हालांकि इस वायरल पत्र का न्यूज वेव झारखंड कोई अधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं करता है.

संगठन की स्थिति बेहद जटिल और गंभीर:

किशन दा ने यह पत्र कॉमरेड सागर(मिसिर बेसरा) को संबोधित करते हुए लिखा था. पत्र की भाषा में हताशा और चिंता साफ झलकती है. उन्होंने स्वीकार किया कि संगठन वर्तमान में अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है उनके अनुसार देश के वर्तमान राजनीतिक और सुरक्षा ढांचे के बीच सशस्त्र विद्रोह को आगे ले जाना अब लगभग असंभव है. पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि संगठन के पास न तो अब पहले जैसा जनसमर्थन है और न ही सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव का सामना करने की शक्ति.

कई बड़े कैडरों का मारा जाना या आत्मसमर्पण करना संगठन की कमर तोड़ चुका है:

पत्र में रणनीतिक क्षेत्रों, विशेष रूप से सेंट्रल रीजनल ब्यूरो और ईस्टर्न रीजनल ब्यूरो का जिक्र किया गया है. किशन दा ने स्वीकार किया कि इन क्षेत्रों में संगठन को अपूरणीय क्षति हुई है. कई बड़े कैडरों का मारा जाना या आत्मसमर्पण करना संगठन की कमर तोड़ चुका है. इसी नुकसान के मद्देनजर उन्होंने ‘सशस्त्र संघर्ष’ पर पुनर्विचार करने की सख्त सलाह दी है. प्रशांत बोस ने पत्र में कुछ ऐसे कड़े सवाल उठाए हैं जो संगठन के अस्तित्व पर प्रहार करते हैं.

जल्द प्रतिक्रिया और भविष्य की रणनीति:

पत्र के अंत में किशन दा ने कॉमरेड सागर से एक गुप्त फोन नंबर के जरिए जल्द संपर्क करने और प्रतिक्रिया देने को कहा था. उन्होंने अत्यंत सतर्कता और सावधानी’ बरतने की अपील की थी,ताकि सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचा जा सके. हालांकि, इस संवाद के प्रभावी होने से पहले ही किशन दा का निधन हो गया, जिससे संगठन के भीतर अब नेतृत्व और विचारधारा के स्तर पर एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है.

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