RANCHI: झारखंड पुलिस महकमे हाल ही में सामने आए वित्तीय अनियमितता और अवैध वेतन निकासी के मामलों ने विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इस घोटाले के उजागर होने के बाद पुलिस मुख्यालय ने आनन-फानन में ट्रेजरी में तीन साल से अधिक समय से तैनात कर्मियों के तबादले का आदेश तो जारी कर दिया है, लेकिन यह कार्रवाई केवल ऊपर की परत को साफ करने जैसी दिख रही है.
असल चुनौती उन पुलिसकर्मियों को लेकर है जो विभिन्न जिलों और महत्वपूर्ण विभागों में अंगद के पैर की तरह सालों से एक ही जगह पर जमे हुए हैं.
फील्ड ड्यूटी के बजाय ऑफिस के मलाईदार पदों पर पिछले कई सालों से तैनात हैं
– राज्य के कई जिलों में ऐसे पुलिसकर्मी हैं जो फील्ड ड्यूटी के बजाय ऑफिस के मलाईदार पदों पर पिछले कई सालों से तैनात हैं.
– स्थापना शाखा: यहां तैनात कर्मी पुलिसकर्मियों की पोस्टिंग और फाइलों का प्रबंधन देखते हैं.
– गोपनीय शाखा: बड़े अधिकारियों के साथ लंबे समय तक जमे रहकर ये कर्मी अपना एक अलग प्रभाव क्षेत्र बना लेते हैं.
– तकनीकी और स्टोर विभाग:यहां भी रोटेशन पॉलिसी का पालन कागजों तक ही सीमित नजर आता है.
तबादला नीति की अनदेखी और पहुंच का खेल
पुलिस मैन्युअल के अनुसार,एक निश्चित अवधि के बाद कर्मियों का तबादला अनिवार्य है ताकि कार्यप्रणाली में पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी प्रकार का नेक्सस न पनपे. जब ट्रेजरी में गड़बड़ी मिली तो वहां तबादले शुरू हुए,तो क्या विभाग अन्य शाखाओं में किसी बड़े घोटाले के इंतजार में बैठा है? आखिर क्यों प्रभावशाली रसूख वाले पुलिसकर्मी एक ही जिले या एक ही टेबल पर जमे रहते हैं.
