Ranchi: झारखंड सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी ‘अबुआ आवास योजना’ वर्तमान में आंकड़ों के जाल और बजट की किल्लत के बीच हिचकोले खाती नजर आ रही है. सरकार ने “अबुआ राज” में हर गरीब को छत देने का वादा तो किया, लेकिन ताज़ा सरकारी आंकड़े वर्ष 2023-24 और 2024-25 चीख-चीख कर कह रहे हैं कि ज़मीनी हकीकत दावों से कोसों दूर है.
1. स्वीकृत आवासों पर ग्रहण: जब लक्ष्य ही पूरा नहीं, तो घर कैसे बनेगा?
आंकड़ों पर गौर करें तो वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए 4,50,000 आवासों का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन सरकार अब तक 4,33,392 आवासों को ही स्वीकृति दे पाई है. यानी लगभग 16,600 से अधिक परिवार आज भी सिर्फ इसलिए कतार में खड़े हैं क्योंकि विभाग ने उनके कागजों पर मुहर तक नहीं लगाई है.
2. किश्तों का अकाल: ‘पहली’ के बाद ‘दूसरी’ के लिए तरस रहे लाभार्थी
योजना की सबसे बड़ी विफलता ‘फंड फ्लो’ में दिख रही है.
वर्ष 2024-25: जहां 2.97 लाख लोगों को पहली किश्त मिली, वहीं दूसरी किश्त तक पहुंचते-पहुंचते यह संख्या घटकर 2.46 लाख रह गई.
गंभीर स्थिति: लगभग 50,000 से ज्यादा परिवार ऐसे हैं जिन्होंने नींव तो खड़ी कर दी, लेकिन अगली किश्त के पैसे न मिलने के कारण उनके मकान खंडहर बनने की कगार पर हैं. क्या सरकार के खजाने में गरीबों के लिए पैसे खत्म हो गए हैं?
3. पूर्णता दर में भारी गिरावट: फिसड्डी जिले सुर्खियों में
रिपोर्ट कार्ड में जिलों का प्रदर्शन शर्मनाक है.
पश्चिम सिंहभूम का बुरा हाल: वित्तीय वर्ष 2023-24 में यहां मात्र 38.39% घर ही पूरे हो सके. 2024-25 में तो हालत और बदतर है, जहां मात्र 30.17% काम पूरा हुआ है.
गोड्डा और गिरिडीह का हाल: गोड्डा (38.51%) और गिरिडीह (55.40%) जैसे जिले भी लाल निशान (Red Zone) में हैं, जो विभाग की सुस्ती को उजागर करते हैं.
4. जियो-टैगिंग और प्रशासनिक सुस्ती का खेल
आंकड़ों से स्पष्ट है कि ‘लिंटल जियो-टैग’ और ‘तीसरी किश्त’ के बीच एक बहुत बड़ी खाई है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में 1.86 लाख घरों का लिंटल लेवल पार हो चुका है, लेकिन केवल 1.23 लाख को ही तीसरी किश्त नसीब हुई.
जब जियो-टैगिंग हो गई, काम दिखने लगा, तो पैसा देने में हाथ क्यों कांप रहे हैं? क्या यह ‘अति महत्वाकांक्षी’ योजना केवल विज्ञापनों तक सीमित रहने वाली है?
जनता का सवाल
सरकार ने वादा किया था कि अबुआ आवास योजना पीएम आवास से भी बेहतर होगी. लेकिन 63.14% (कुल औसत) की कछुआ चाल वाली प्रगति बताती है कि सिस्टम में ‘पैसे की कमी’ और ‘इच्छाशक्ति का अभाव’ दोनों है. गरीब ने अपनी झोपड़ी तोड़कर मकान की नींव तो डाल दी, अब वो न घर का रहा न घाट का.
