चुनावी बिसात पर भाजपा का महिला कार्ड, भविष्य की लिखी जा रही पटकथा

Ravi Bharti Ranchi: झारखंड की सियासत में इन दिनों सड़कों पर उतरता जनसैलाब सिर्फ विरोध का प्रतीक नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा...

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Ranchi: झारखंड की सियासत में इन दिनों सड़कों पर उतरता जनसैलाब सिर्फ विरोध का प्रतीक नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनावों की पटकथा लिख रहा है. राजधानी रांची की सड़कों पर भाजपा की महिला आक्रोश मार्च ने यह साफ कर दिया है कि भाजपा अब राज्य की आधी आबादी को अपने पाले में करने के लिए आक्रामक रणनीति पर काम कर रही है. साथ ही राज्य के राजनीतिक विमर्श को महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण पर केंद्रित कर दिया है.

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‘वोट बैंक’ से ‘निर्णायक शक्ति’ तक

राजनीतिक गलियारों की चर्चा को माने तो भाजपा की इस रैली के मायने सिर्फ सड़क प्रदर्शन तक सीमित नहीं है. भाजपा ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को ढाल बनाकर कांग्रेस और झामुमो को ‘महिला विरोधी’ सिद्ध करने की जो कोशिश की है, वह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और केंद्र की योजनाओं को आगे रखकर पार्टी झारखंड के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की महिलाओं में पैठ बनाना चाहती है.

इंडी गठबंधन की घेराबंदी और ‘मईया योजना’ पर वार

भाजपा ने इस रैली के जरिए राज्य सरकार की ‘मईया योजना’ को ‘ढकोसला’ करार देकर सरकार के सबसे बड़े मास्टरस्ट्रोक पर सीधा हमला बोला है. अन्नपूर्णा देवी और बाबूलाल मरांडी जैसे दिग्गजों के बयानों से स्पष्ट है कि भाजपा आगामी चुनावों में महिला अपराध, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाएगी. 16-17 अप्रैल की घटनाओं का हवाला देकर कांग्रेस को ‘अधिकार छीनने वाली पार्टी’ के रूप में पेश करना, मतदाताओं के बीच एक नया नैरेटिव सेट करने का प्रयास है.

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क्षेत्रीय समीकरण और दिग्गज चेहरों का जमावड़ा

रैली में अर्जुन मुंडा, चंपई सोरेन, रघुवर दास और गीता कोड़ा जैसे दिग्गजों की मौजूदगी ने यह संदेश देने की कोशिश की गई कि भाजपा पूरी तरह एकजुट है. विशेषकर कोल्हान और संताल परगना जैसे क्षेत्रों से महिलाओं की भागीदारी संकेत दे गई कि झामुमो के पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी की तैयारी की जा रही है। इसकी वजह पद्मश्री विजेताओं (छुटनी महतो और जमुना टुडू) का मंच पर होना भाजपा के दावों को सामाजिक स्वीकार्यता दिलाने की एक प्रभावी कोशिश रही. यदि भाजपा इस ऊर्जा को बूथ स्तर तक ले जाने में सफल रहती है, तो आने वाले चुनाव में ‘महिला फैक्टर’ सबसे बड़ा गेम-चेंजर साबित होगा. अब झारखंड की राजनीति सिर्फ जाति और जल-जंगल-जमीन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसमें ‘सम्मान और सुरक्षा’ का मुद्दा सबसे ऊपर होगा.

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