डिजिटल इंडिया को चिढ़ाती इटवा पत्थर की बदहाली: चुआं के गंदे पानी से बुझ रही आदिवासियों की प्यास

Hazaribagh: एक ओर जहाँ हमारा देश ‘डिजिटल इंडिया’ के नारों के साथ अंतरिक्ष की ऊंचाइयों को छू रहा है और चांद-मंगल पर...

Hazaribagh: एक ओर जहाँ हमारा देश ‘डिजिटल इंडिया’ के नारों के साथ अंतरिक्ष की ऊंचाइयों को छू रहा है और चांद-मंगल पर विजय का जश्न मना रहा है, वहीं हजारीबाग जिले के विष्णुगढ़ प्रखंड से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो व्यवस्था को आईना दिखाने के लिए काफी है. चानो और बनासो पंचायत की सीमा पर स्थित आदिवासी बहुल गाँव ‘इटवा पत्थर’ आज भी आदिम युग जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में सिसक रहा है.

चुआं का पानी: मजबूरी या नियति?

प्रचंड गर्मी के इस मौसम में जब जलस्तर नीचे चला गया है, इटवा पत्थर के ग्रामीणों के लिए एक-एक बूंद पानी संघर्ष का पर्याय बन गया है. गाँव में पीने के पानी का कोई पुख्ता साधन नहीं है. ग्रामीण आज भी पथरीले रास्तों से गुजरकर ‘चुआं’ (मिट्टी खोदकर बनाया गया गड्ढा) तक जाने को मजबूर हैं. स्थानीय ग्रामीणों ने कहा कि हमें डर लगता है कि कहीं यह गंदा पानी हमारे बच्चों को बीमार न कर दे, लेकिन प्यास बुझाने के लिए हमारे पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.

विकास के दावों की पोल खोलती तस्वीरें

गाँव की बदहाली केवल पानी तक सीमित नहीं है. यहाँ की स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि सरकारी योजनाओं की पहुँच इस गाँव की सीमा पर आकर दम तोड़ देती है.

स्वास्थ्य का खतरा

चुआं का खुला और दूषित पानी पीने से ग्रामीणों में जलजनित रोगों  का खतरा हमेशा बना रहता है. चानो और बनासो पंचायत की सीमा पर होने के कारण यह गाँव अक्सर ‘सीमा विवाद’ और ‘उपेक्षा’ का शिकार होकर रह जाता है.

डिजिटल युग में आदिमजीवन

यह विडंबना ही है कि जिस दौर में हम 5G और हाई-टेक सुविधाओं की बात कर रहे हैं, वहाँ एक पूरी आबादी सिर्फ इसलिए प्यासी है क्योंकि उनके पास एक स्वच्छ जल स्रोत नहीं है. ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन वोट मिलते ही इटवा पत्थर की प्यास को भुला दिया जाता है.

प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती

इटवा पत्थर की यह स्थिति प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है. क्या ‘हर घर नल का जल’ जैसी योजनाएं केवल कागजों तक सीमित रहेंगी, या इन आदिवासी परिवारों को भी कभी शुद्ध पेयजल नसीब होगा? यह सवाल आज भी अनुत्तरित है.

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