Ichagarh : क्षेत्र में इन दिनों हाथियों की मौजूदगी और मानव-वन्यजीव संघर्ष को लेकर ग्रामीणों के बीच चर्चा तेज हो गई है. लोगों का कहना है कि सवाल यह नहीं है कि हाथी कहां से आए, बल्कि यह है कि उनके रहने के जंगल आखिर खत्म किसने किए.

ग्रामीणों का मानना है कि वन्य जीव-जंतु मानव जीवन से पहले इस धरती पर मौजूद थे. ऐसे में यदि आज हाथी गांवों और बस्तियों की ओर आ रहे हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं इंसानी दखल जिम्मेदार है. लोगों ने कहा कि गांव में हाथी पहुंचते हैं तो उन्हें खदेड़ा जाता है और शहरों में जाने पर बवाल खड़ा हो जाता है, लेकिन कोई यह नहीं सोचता कि उनके प्राकृतिक आश्रय स्थल लगातार खत्म हो रहे हैं.

जंगलों में नहीं बचा भोजन और पानी

स्थानीय लोगों के अनुसार जंगलों में अब पहले जैसी हरियाली और संसाधन नहीं बचे हैं. लगातार पेड़ों की कटाई, जंगलों में आग लगने और अवैध कब्जों के कारण हाथियों के लिए भोजन और पानी की समस्या बढ़ गई है. ग्रामीणों ने कहा कि हाथी भी प्रकृति का हिस्सा हैं और उन्हें भी जीने का उतना ही अधिकार है जितना इंसानों को.
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एक समय इंसान और वन्यजीव साथ रहते थे

ग्रामीणों ने पुराने समय को याद करते हुए कहा कि कभी इंसान और वन्य जीव एक ही नदी का पानी पीते थे और प्रकृति के साथ संतुलन बना हुआ था. लेकिन अब विकास के नाम पर जंगलों और वन्यजीवों के प्राकृतिक क्षेत्र में लगातार हस्तक्षेप किया जा रहा है.
खत्म हो रहे हाथियों के कॉरिडोर

दलमा क्षेत्र से निकलकर हाथियों का झुंड अब ईचागढ़, कुकड़ू और चांडिल इलाके में भटकता नजर आ रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर में अब खनन, सड़क निर्माण, खेती और बस्तियां बस चुकी हैं. इसी वजह से मानव और हाथियों के बीच संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं.
संतुलन बनाए रखने की जरूरत
स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि विकास जरूरी है, लेकिन जंगल और वन्यजीवों की कीमत पर नहीं. यदि हाथियों को उनका प्राकृतिक घर, भोजन और रास्ता नहीं मिलेगा तो वे गांव और शहरों की ओर आने को मजबूर होंगे. ग्रामीणों ने प्रशासन और समाज से अपील की है कि वन्यजीवों के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को लेकर गंभीरता से सोचने की जरूरत है.
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